पुस्तक पढ़ने के प्रति कम होता आकर्षण

एक बार फिर किताबों से दोस्ती करने का बेहतरीन मौका मिला. १६ नवम्बर को जमशेदपुर सिटी में पुस्तक मेला का धूमधाम से आगाज हुआ. इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद कोलकाता की प्रसिद्ध लेखिका व फिल्म निर्माता शतरुपा सान्याल ने कहा कि किताब से कीमती उपहार कुछ नहीं हो सकता. पुस्तकों के बिना जीवन अधूरा है. किताबों से दोस्ती करने पर बुरी आदतों से छुटकारा मिलेगा. किताबों से दूरी चिंता का विषय है. इस कारण नई पीढ़ी सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों को समझ नहीं पा रही है. लोकमान्य तिलक ने भी कहा था- “मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्योंकि जहाँ यह रहेंगी वहां स्वयं ही स्वर्ग बन जाएगा”. इससे पूर्व अतिथियों का स्वागत टैगोर सोसाइटी के चेयरमैन डॉ. एचएस पाल ने किया. महासचिव आशीष चौधरी ने पुस्तक मेला के इतिहास पर प्रकाश डाला. श्री आशीष चौधरी ने सेक्रेटरी रिपोर्ट में कहा कि दो वर्षों से खराब मौसम के कारण पुस्तक मेला प्रभावित रहा. बीते वर्ष 40 हजार पुस्तकप्रेमी आए थे. 50 लाख का कारोबार हुआ था. 25 नवंबर तक चलनेवाले पुस्तक मेले में 71 प्रकाशक किताबों का खजाना लेकर आए हैं. कई नए प्रकाशक इस बार पहली बार स्टॉल में आये. इनमें वुडपेकर, सेल रकाब पुठी सेंटर, एनलिवेन, पेंगुईन पब्लिशर्स के नाम प्रमुख हैं. उन्होंने कहा कि इस बार मेले में 71 प्रकाशकों ने स्टॉल लगाए हैं. इसमें युवा वर्ग, बच्चों, पुरुष, महिलाओं के अलावा साहित्य प्रेमियों को पसंद आने वाली किताबें शामिल थीं.

स्थानीय प्रकाशकों में ‘सहयोग’ नामक संस्था को आयोजकों ने नि:शुल्क स्टॉल उपलब्ध कराया है, ताकि शहर में लेखकों की प्रतिभा को एक मंच मिल सके. इसके अलावा सेल्यूलाइड चैचटर, रामकृष्ण मिशन, पुस्तक मंजूषा, योगदा सत्संग सोसाइटी, आजाद किताब चार, ओशो सुरती मेडिटेशन सेंटर, गुरमत प्रचार सेंटर, टैगोर, चिन्मया वाणीको लोटस पब्लिकेशन, पेंगुइन हाउस, मार्शल बामरा, एसएस पब्लिकेशंस, भारत पुस्तक भंडार, राय बुक, माई बुक एंड नोबेल को स्टॉल उपलब्ध कराया गया. मेले में धार्मिक, सामाजिक, खेल-कूद, स्कूल कॉलेज के सिलेबस से सम्बंधित और बच्चों बुजुर्गों हर किसी से सम्बंधित लगभग सभी विषयों की पुस्तकें उपलब्ध थी.
हिन्दी के प्रकाशक : सस्ता साहित्य मंडल, राही प्रकाशन, किताब घर प्रकाशन, प्रकाशन संस्थान, पूजा बुक हाउस, राजकमल प्रकाशन 25 नवंबर तक चलने वाले मेले का प्रवेश शुल्क पांच रुपए रखा गया. यूनिफार्म में आने वाले स्कूली विद्यार्थियों से दो रुपए शुल्क लिया गया. युवाओं को पुस्तकों से जोड़ने के लिए इंटर स्कूल क्विज का आयोजन 18 नवंबर को किया गया जिसमे शहर के विभिन्न स्कूलों के छात्रों ने अपनी हिस्सेदारी दिखलाई. रोजाना यह पुस्तक मेला दो बजे से रात के 8:30 बजे तक लोगों के लिए खुला रहा. शनिवार और रविवार को यह सुबह के दस बजे से रात के 8:30 बजे तक खुला रहा. २५ नवम्बर को रात्रि ९ बजे इस पुस्तक मेले का समापन हुआ. पुस्तक मेला में बुजुर्गो एवं असहाय लोगों के लिए व्हील चेयर की भी व्यवस्था की गयी थी. 10 दिनों तक चलने वाले इस मेले में हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा बांग्ला, उर्दू, संथाली, हो, कुरमाली और गुरमुखी भाषा की पुस्तकें भी देखने को मिली. प्रकाशक दिल्ली, कोलकाता, मुंबई समेत देश के विभिन्न शहरों से आये थे.
वाजपेयी की किताबें बेस्टसेलर

किताब घर प्रकाशन के श्री जेपी शर्मा ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद ‘मेरी 51 कविताएं की नौ हजार से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. वाजपेयी की ‘शक्ति से शांति, ‘विचार बिंदू,”बिंदू बिंदू विचार, ‘कुछ लेख कुछ भाषण, ‘न दैन्यं न पलायनम और ‘नई चुनौती नया अवसर किताबों की मांग है. भगवान सिंह की ‘भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर आकर्षण का केंद्र है.

गुरमत प्रचार केंद्र ने पुस्तक मेला में धार्मिक बुक स्टाल लगाया है. अकाली दल के जत्थेदार जरनैल सिंह ने अरदास की. केंद्र के प्रचारक हरविंदर सिंह जमशेदपुरी ने बताया कि धार्मिक किताबों पर सिख संगत को 10 फीसदी और नौजवान भाई-बहनों को 20 फीसदी छूट है.

18 नवंबर को इंटर स्कूल क्विज हुआ, जिसका विषय ‘भारतीय साहित्य’ ही रखा गया था. इसमें शहर के 15 स्कूलों की टीमों ने शिरकत की. 21 नवंबर को हिन्दी सेमिनार हुआ, जिसमें साहित्य और पत्रकारिता के संबंधों पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में भाग लेते हुए शहर के प्रख्यात कथाकार श्री जयनंदन ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य में चोली दमन का सम्बन्ध है क्योंकि दोनों ही समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं. अंतर इतना है कि साहित्य में कल्पना के साथ सृजन भी होता पत्रकार सत्य को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करते हैं. पर आज पत्रकारिता का व्यवसायीकरण हो गया है और कुछ पत्रकार बंधु किसी संस्था या राजनीति के पक्षकार बने बैठे हैं.

पटना का ऐतिहासिक पुस्तक मेला इस साल नहीं लगेगा. बताया जाता है कि 6-17 दिस्मबर को आयोजित होने वाली इस पुस्तक मेला को कैंसिल कर दिया गया है. पटना पुस्तक मेला के संयोजक अमित झा ने बताया कि – पिछले 33 वर्षों से लगनेवाला सांस्कृतिक महोत्सव CRD पटना पुस्तक मेला का 25 वां संस्करण 6 से 17 दिसंबर 2018 निर्धारित था. देश का यह चर्चित आयोजन पिछले साल की तरह इस बार भी ज्ञान भवन में होना तय हुआ था. अभी पिछले दिनों ज्ञात हुआ कि ज्ञान भवन का किराया पिछले साल की तुलना में इस बार ढाई गुणा बढ़ कर 1 लाख रुपये प्रतिदिन से 2.5 लाख रुपये प्रतिदिन हो गया है. पुस्तक मेला 12 दिन का होता है पर उसकी तैयारी और अंत में हटाने केलिए कम-से-कम 6 दिन का समय लगता है. यानी 18 दिन का 18 लाख. इसके 2.5 लाख होने के कारण इस बार किराया 18 लाख से बढ़ कर करीब 50 लाख पहुँच गया है. यानी पटना में इस बार पुस्तक प्रेमियों को अच्छी-अच्छी पुस्तकें देखने को नहीं मिलेगी.

मैंने भी जमशेदपुर पुस्तक मेले का कई बार भ्रमण किया. कुछ गतिविधियों का साक्ष्य भी बना. २३ नवम्बर को मुख्य रूप से महिलाओं की बहुभाषीय संस्था ‘सहयोग’ के द्वारा दो पुस्तकों उनकी ‘कहानी उनकी जुबानी’ और ‘कंटीले कैक्टस के फूल’ का लोकार्पण झारखण्ड सरकार के मंत्री श्री सरयू राय के द्वारा किया गया और प्रतिभागी महिलाओं को सम्मानित किया गया. मंत्री श्री सरयू राय ने इस बात पर खुशी जाहिर की कि झारखण्ड में भी महिला साहित्यकार कम नहीं है.

२४ नवम्बर को पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा के हाथों डॉ. कमलकांत द्वारा लिखित ‘अपराध का बोध’ का लोकार्पण किया गया जिसमे शहर के जाने माने कथाकार, साहित्यकार और पत्रकारों ने भाग लिया. सबों में श्री अर्जुन मुंडा से साहित्यकारों के लिए सरकारी सहयोग की अपेक्षा की. पर सांसद अर्जुन मुंडा का जवाब गोल-मोल रहा. उन्होंने मुख्य बात जो कही वह हर कोई जानता है. वह है कि आज के डिजिटल युग में लोगों की किताबों के प्रति रूचि घटी है. क्रिकेट, फुटबॉल तथा अन्य खेल कूद तथा दूसरी सांस्कृतिक गतिविधियों में, धार्मिक जुलूसों में लोगों की भागीदारी ज्यादा बढ़-चढ़कर  होती है. पर पुस्तकों के प्रति लोगों में अभिरूचि का अभाव देखा जा रहा है. पहले जहाँ इसी पुस्तक मेला में काफी भीड़ देखी जाती थी. हमारे कई मित्र दो-तीन हजार की पुस्तकें खरीद लेते थे. इस बार नदारद रहे. अन्य कई मित्र व्यस्तता के कारण मेले में नहीं जा सके. कई पुस्तक स्टाल के संचालकों से बात चीत कर पता चला कि वे लोग इस बार काफी कम बिक्री होने से निराश हैं. खर्चा निकालना मुश्किल हो रहा है. कारण है – बढ़ते हुए मूल्यों के कारण पुस्तकों की छपाई में भी खर्चे अधिक हो रहे हैं और खरीदनेवाले दाम देखकर पुस्तक नहीं खरीद पाते. हम इस बाजारवादी युग में दूसरे खर्च तो कर रहे हैं. घर को सजाने संवारने में तथा हर साल नए नए मोबाइल तथा दूसरे विलासिता के उपकरणों में तो खर्च कर रहे हैं पर पुस्तकों की खरीद पर नहीं. खरीद कर भी पढ़ने के प्रति झुकाव कम हो रहा है. जब तक हम पढेंगे नहीं एक दूसरों की भावनाओं और विचारों से परिचित कैसे होंगे? नव-लेखकों में सृजन के प्रति उत्साह-वर्धन कैसे होगा? सरकार तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों को इसमें जागरूकता बढ़ानी होगी. मोदी जी ने भी कहा था- गूगल से ज्ञान नहीं होता. ज्ञान का स्रोत पुस्तकें ही हैं. इस आलेख के माध्यम से मेरा निवेदन यही है कि हमलोगों में पुस्तकें पढ़ने की रूचि जगाई जानी चाहिए और इस प्रकार के आयोजनों में अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए.

  • जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.