आज की द्रोपदियां

कृष्ण लाल कपूर एक्यूप्रेशर और होम्योपैथी के जाने-माने डॉक्टर थे. यों तो कई मानसिक रोगियों का इलाज भी वे सफलतापूर्वक कर चुके थे, पर आज एक महिला उसको ही मानसिक रोगी का खिताब देकर गई थी, जिससे वे उबर नहीं पा रहे थे.
उनको पता नहीं था कि बीमार के रूप में आई श्वेता दृढ़ निश्चय के साथ उसके क्लिनिक में घुसी थी. पीठ का दर्द बताकर उसने दवाई भी ली थी और एक्यूप्रेशर करवाने को भी मान गई थी. उसको और क्या चाहिए था! गदराया हुआ यौवन उसकी कमजोरी जो थी. उसने श्वेता को साथ वाले कमरे में स्ट्रेचर पर लेटने को कहा.
श्वेता अच्छी बच्ची की तरह स्ट्रेचर पर लेट गई थी. कृष्ण लाल उसको देखते ही रह गए. एक डॉक्टर का अगला आदेश था- ”अपने हुक ढीले करो.”
”चटाक! लो एक हुक ढीला कर दिया.” कृष्ण लाल अपने गाल को सहलाने लगे.
”तभी दूसरे गाल पर चटाक! ये लो दूसरा हुक भी ढीला कर दिया, अभी और भी करूं?”
हथौड़े जैसी चोट से चोटिल कृष्ण लाल दोनों गालों को सहलाने में लगे थे, कुछ बोल नहीं पाए.
”मुझे नीरू ने तुम्हारे फरेब के बारे में सब बता दिया था.” श्वेता ने अपना कथन जारी रखा, ”मैं पूरी तरह तैयार होकर आई थी मिस्टर कृष्ण लाल! मैंने ही बहुत-से लोगों को वाट्सऐप पर एक्यूप्रेशर के पॉइंट्स के बारे में मैसेज भेजा था, कि हमारे हाथों और पैरों में ही एक्यूप्रेशर के सभी पॉइट्स हैं. नीरू तो किसी तरह बचकर भाग निकली थी, पर तुम्हें सबक भी तो सिखाना था न!” श्वेता की तेज आवाज सुनकर कृष्ण लाल की पत्नी भी घर के अंदर से वहां आ गई थी.
”मिस्टर कृष्ण लाल! मेरे जाने के बाद अपने गेट पर लगी नेमप्लेट को चेक कर लेना.” जाते-जाते श्वेता एक और चोट कर गई थी, ”तुम कृष्ण कहलाने लायक तो हो ही नहीं. इसलिए अब से लोग तुम्हें कंस लाल कहेंगे.” श्वेता गुस्से से घुड़की थी.
”और एक बात ध्यान से सुन लो मानसिक रोगी! अब से कॉलोनी की कोई भी महिला या लड़की तुम्हारे क्लिनिक में नहीं आएगी, तुम पुरुष द्रोपदी की लाज बचाने वाले आज के कृष्ण नहीं बनोगे, तो हम नारियों को ही आज की द्रोपदियां बनना पड़ेगा.”
श्वेता के जाने बाद डॉक्टर ने अपनी नेमप्लेट पर से दुर्योधन लाल वाला कागज तो अच्छी तरह खुरच दिया था, पर आज की द्रोपदी के खिताब को कैसे खुरच पाता!

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।