अंजू – भाग 2

घर जाकर अंजू पढ़ने का बहाना बनाकर एक किताब लेकर चुपचाप एक कोने में बैठ गई। वह मन ही मन सोचने लगी..” यह कैसा एहसास है? यह मुझे क्या हो गया? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं खुशी के पंख लगा कर दूर गगन में उड़ रही हूं! बादलों से बात कर रही हूं! और हवाओं से पूछ रही हूं कि ‘अंजू आज तू इतनी खुश क्यों हैं?’ मन गुनगुना रहा है..”आजकल पांव जमीं पर पड़ते नहीं मेरे…!” फिर..कभी कभी मुझे एक अनजान डर, डराकर जाता है और कहता है अंजू यह ठीक नहीं है। तू इतनी हवाओं में मत उड़। पांव जमीन पर रख ले जरा, अपनी हैसियत तो देख, इतनी खुश क्यों हो रही है तू? तुझे मालूम भी है कि दुनिया कितनी बेदर्द है। जब तेरे सपने टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएंगे तो इतनी चोट लगेगी कि संभल नहीं पाएगी।’

दो दिन अंजू मां के साथ काम पर नहीं आई तो धर्मेंद्र को कुछ कमी लग रही थी। दिल के कोने में कहीं कुछ सूनापन सा महसूस हो रहा था। पूरे वातावरण में एक खालीपन एक उदासी का जैसे एक आवरण छाया हुआ था। मन में उतावलापन है और यह उतावलापन क्यों है उसे समझ में नहीं आ रहा था। हर आहट पर नजरें उठ जाती और बाहर झांकने लगती है, ऐसा लग रहा है आंखें किसी का इंतजार कर रही है‌। मौका देखकर उसने जमुना बाई से पूछ लिया..” आंटी.. अंजू काम पर क्यों नहीं आ रही है? क्या उसकी तबीयत खराब है?”
“नहीं साहब, तबीयत तो खराब नहीं है। पर.. ना जाने क्या हो गया, गुमसुम रहती है। किसी से ज्यादा बात नहीं करती है। पहले जैसे हंसती बोलती नहीं है। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कभी-कभी डर लगता है, लड़की सयानी हो रही है न।”.. जमुना बाई ने चिंता जताते हुए कहा।

एक दिन अचानक धर्मेंद्र को अपने घर में आते हुए देख कर जमुना बाई तथा अंजू थोड़ी डर गई, सोचा कुछ गलती हो गई है, शायद इसलिए बताने के लिए आए हैं साहब। जमुना बाई को समझ में नहीं आया कि क्या करें उसने तुरंत एक कुर्सी देते हुए कहा..” बैठिए साहब, हमारा बड़ा भाग्य है जो आप हमारे घर में आये हैं। कोई जरूरत थी तो हमें बुला लेते, हम ही आ जाते। आपने तकलीफ क्यों की साहब?”
“अरे.. नहीं आंटी, कोई जरूरत नहीं है। मुझे बस आप दोनों से कुछ बातें करनी है, इसलिए थोड़ा सा समय निकाल कर आ गया हूं।”.. धर्मेंद्र ने बहुत ही शांत भाव से कहा।
“क्या बात है साहब, अंजू ने कोई गलती की है क्या? या फिर मुझसे कोई गलती हो गई।”.. जमुना बाई ने डरते हुए पूछा।
“नहीं.. आंटी ऐसी कोई बात नहीं है। अंजू तो बहुत दिनों से काम पर भी नहीं आ रही है, गलती कैसे होगी। अंजू को क्या हो गया, काम पर क्यों नहीं आ रही है? मेरी किसी बात का बुरा तो नहीं माना।”.. धर्मेंद्र ने बहुत ही शालीनता से कहा।
“नहीं साहब, वो कह रही थी कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। मैंने सोचा कुछ दिन आराम करने दो, इसलिए काम पर नहीं आई।”…जमुना बाई ने धीरे से कहा।
“कहां है अंजू? मुझे देख कर छुप गई है, बुलाईए उसे। आप दोनों के सामने ही मुझे कुछ बात करनी है।”.. धर्मेंद्र ने थोड़ा सा विचलित होते हुए कहा।

अंजू आकर मम्मी के बगल में बैठ गई सिर झुकाके। उसे बहुत डर लग रहा था, पता नहीं.. क्या बात करने वाले हैं धर्मेंद्र साहब! एक अनजान डर से मन बैठा जा रहा था उसका। दिल जोर से धड़क रहा था। चेहरे की रंगत ऐसी उड़ी हुई थी जैसे किसी गुलाब के मुरझा जाने पर उसका रंग उड़ जाता है। आँखें उठाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही है। उसे लग रहा है, आंखें उठ गई तो सारा राज खुल जाएगा। जमुना बाई और अंजू बिल्कुल चुपचाप बैठे हुए थे, उदास चेहरा लिए।
दोनों की चुप्पी देखकर धर्मेंद्र समझ गया कि दोनों डरे हुए हैं। इसलिए माहौल हल्का करने के लिए उसने जल्दी से बात छेड़ी..” आंटी,अंजू को क्या हो गया है? आप कह रही थी गुमसुम रहती है।”
“आप ही पूछ लीजिए साहब आपके सामने ही तो बैठी है!”
“हां, तो अंजू बताओ, क्या हो गया तुम्हें? इतना उदास चेहरा लेकर क्यों बैठी हो? तबीयत खराब हो तो चलो डॉक्टर के पास ले चलते हैं।”.. धर्मेंद्र ने अपनापन दिखाते हुए कहा।
डॉक्टर की बात सुनते अंजू घबरा गई। डॉक्टर के पास जाएगी तो क्या कहेगी। उसने चुप्पी तोड़ते हुए कहा..” नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, बस यूं ही मन थोड़ा उदास था। इसलिए काम पर नहीं आई थी।”
“आंटी आप दोनों ही सामने बैठे हैं। आप दोनों से ही में जानना चाहता हूं कि आप लोगों की राय क्या है!”
“किस बारे में साहब, आप किस बारे में बात कर रहे हैं?”
“आंटी, मैं.. मैं अंजू को पसंद करता हूं। और उससे शादी करना चाहता हूं। इस बारे में आप दोनों के विचार जानना चाहता हूं।”
“पर.. साहब यह कैसे संभव हो पाएगा! एक नौकरानी की बेटी से शादी, आपके मां, पिताजी कैसे मानेंगें? ऊपर से हम ठहरे नीचे जात के और आप लोग ऊंचे जात के।”.. जमुना बाई की आंखों में चिंता स्पष्ट झलक रही थी।
“अमीर, गरीब और जात, पात की बात आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि आप दोनों तैयार है कि नहीं।”.. धर्मेंद्र की बातों में दृढ़ता थी।
“साहब.. आप अंजू से पूछ लीजिए, अगर वह तैयार है तो मुझे उसकी खुशी के लिए तैयार होना ही पड़ेगा। पर मेरे मन में डर है कहीं कुछ गड़बड़ी ना हो जाए। आप के यहां काम करके मेरा गुजारा होता है, काम भी छूट गया तो मैं बाकी दो बच्चों के साथ कैसे जिऊंगी।”.. कहते कहते जमुना बाई की आंखों से आंसू छलक आए।
“आंटी, अगर एक बार अंजू से शादी हो गई मेरी, तो.. आपको काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आपको मुझ पर भरोसा है ना।”.. धर्मेंद्र ने दृढ़ता से कहा।
“बहुत भरोसा है साहब! आपके भरोसे पर ही तो हम जिंदा है!”.. जमुना बाई की आंखों में याचना स्पष्ट झलक रही थी।
“बताओ अंजू, तुम्हारी क्या इच्छा है। तुम्हारे ऊपर कोई दबाव नहीं है, तुम दबाव में आकर या डर कर कोई बात मत करना। जो तुम्हारा मन चाहता है वही बातें करना।”.. धर्मेंद्र ने समझाते हुए कहा।
“हां, मैं तैयार हूं, पर.. आपके मां,पापा मानेंगे क्या? वह गुस्सा हो गए तो हमारा क्या होगा? मुझे उनसे डर लगता है। और फिर मेरे कारण आपको कोई परेशानी आए, यह भी मैं नहीं चाहती। दुनिया वाले आप पर उंगली उठाएंगे, आपको बुरा भला कहेंगे तो मुझे सहन नहीं होगा।”.. अंजू की आंखों की पलकें भीगी हुई थीं।
“बस, मुझे जो सुनना था मैंने सुन लिया। अब मैं चलता हूं, आगे की चिंता आप लोग मत करिए। मुझ पर छोड़ दीजिए। रहा सवाल दुनिया वालों का, तो मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं दुनिया वालों से डर के कोई काम नहीं करता और फिर मैं कोई गलत काम भी नहीं कर रहा हूं। एक लड़की से प्यार करता हूं और जिसे मैं जिंदगी में कुछ कर दिखाने के लिए प्रेरित कर रहा हूं। दुनिया वालों की नजर में यह गलत हो सकता है पर मेरी नजर में नहीं। मुझे अपने आप पर विश्वास है कि मैं अपने मम्मी पापा को मना लूंगा।”.. कहकर धर्मेंद्र निकल गया। आज उसके मन बगिया में खुशी के रंग बिरंगे फूल खिलकर सुगंध से रोम रोम को महका रहे हैं। मन बावरा पंख फैलाकर दूर गगन में उड़े चला जा रहा है।
पहले प्यार का पहला नशा इतना मधुर होता है यह आज उसे पता चला है। वह गुनगुनाते हुए चले जा रहा है.. “पहला नशा.. पहला खुमार.. नया प्यार है.. नया इंतजार..!!”

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com