सियासतदानों की कथनी और करनी में फ़र्क़ क्यों?

आज के दौर में राजनीति के रणबाँकुरे साम, दाम, दंड और भेद सभी का उपयोग सत्ता प्राप्त करने के लिए करते हैं। सत्ताशीर्ष पर बनें रहना ही जब राजनीतिक दलों का पहला और अंतिम धेध्य बन जाएं। फ़िर राजनीतिक शुचिता और सामाजिक समानता आदि की बातें भोथरी साबित होने लगती हैं। हम बात यहां पर सरदार पटेल जी की स्मृति में बनाई गई प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी और वर्तमान राजनीतिक मनोदशा की करते हैं। स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई किसी पहचान के मोहताज़ नहीं, लेक़िन राजनीति और समाज का यह फ़र्ज़ बनता है अपने समाज निर्माताओं को सम्मान दें, और उनके विचारों को अपनी आगामी पीढ़ी में सिंचित करे। जिससे समाज को बेहतर और चरित्रवान युवाओं की फ़ौज मिल सकें। ऐसे में हम बात करें तो आज भारत खुद को अगर महाशक्ति के रुप में स्थापित करने के पथ पर अग्रसर है। भारत सरकार द्वारा ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का नारा दिया जा रहा है। इससे हटकर देखें तो आज के इस पंथनिरपेक्ष, सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतन्त्रात्मक भारत गणराज्य की कल्पना करना भी असम्भव होता, अगर भारत मां की कोख से एक सच्चे सपूत ने जन्म ना लिया होता। जिसका नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल है।

यहां पर ऐसे में जिस दौर में देश की राजनीतिक व्यवस्था में कटुता बढ़ती जा रहीं, सिर्फ़ सत्ता का रसास्वादन राजनीतिक दलों का उद्देश्य रह गया है। उस दौर में सरदार पटेल जी के विचारों का अनुसरण भी अगर किया जाएं। तो उनके सम्मान में बनाई गई स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की महत्ता ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ जाएगी। आज सवाल भारतीय राजनीति को देखकर यहीं, कि जिस विराट व्यक्तित्व के लिए स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण किया गया। क्या उनके विचारों को अमल में लाने का फ़ितूर भी किसी दल में है। फिर वह चाहें सत्तारूढ़ दल हो, या विपक्ष। जिस विराट व्यक्तित्व के बल पर देश की 562 रियासतें एकजुट हुई। जहां के परिवेश में अब वही देश के भीतर अलगाव की बू अनेक स्तर से दिख रहीं। तो पहला सवाल यहीं, कि हम, हमारा समाज, हमारी व्यवस्था और हमारी सरकारें देश और समाज में एकजुटता के लिए कितनी कोशिशें करते हैं? शायद आज के दौर में यह कवायद शून्य बटे सन्नाटा ही मालूम पड़ती है। फ़िर सिर्फ़ सरदार जी के याद में स्टैच्यू का निर्माण कर देना ही सब कुछ नहीं है। हमारा संविधान भी कहता है, मौलिक अधिकारों के अंतर्गत सभी को स्वतंत्रता, समानता का हक़ प्राप्त होना चाहिए, जो आज़ादी के सात दशक बाद भी नहीं मिला। फ़िर कहीं न कहीं सिर्फ़ राजनीति के हैसियतदार देश के महापुरुषों और विराट व्यक्तित्व का राजनीतिक उपयोग ही कर रहें हैं। अब जब देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले विशाल व्यक्तित्व के धनी शख्सियत की प्रतिमा का अनावरण भी हो गया है। तो यह समझना भी बेहद ज़रूरी है, कि हम किस स्तर तक सरदार पटेल के एकता मूलमंत्र पर डटे हुए हैं। आज हमारा समाज जाति-धर्म, सम्प्रदाय और भाषा के अलावा ग़रीबी-अमीरी आदि के खांचे में बंटता जा रहा। फ़िर हम कहीं सरदार पटेल के मूलमंत्र से इतर होकर आगे तो नहीं बढ़ रहे। यह बड़ा और यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है। लोकतांत्रिक सांचे में विचारों की भिन्नता उसकी खूबसूरती में चार-चांद लगाती है, लेकिन आज की राजनीति पहले से बहुत ज्यादा आरोपित और दूषित हो चली है। समाज को बांटने की आरोपी। दूसरे पक्ष की विचारधारा को जमींदोज करने की आरोपी। इसके लिए शायद ही कोई दल अपवाद हों। मत के लिए के लिए कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर। तो कभी किसी अन्य मुद्दे के बहाने समाज की एकता और अखंडता को तार-तार किया जाता है। जब एक तरफ़ स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के अनावरण की जोरदार तैयारियां चल रहीं थी, उसी दरमियाँ दूसरी ओर गुजरात में हुए एक घिनौने अपराध ने देश के सामने एक स्थिति ऐसी पैदा की। जिसने यह साबित कर दिया क्षेत्रवाद के चपेट में देश अभी भी जी रहा है। हम अखण्ड भारत की रट भले लगाते फ़िरते हैं, लेकिन वह राज्यों के समूह से ज़्यादा कुछ नहीं। जहां पर हर राज्य के लोग दूसरे राज्यों के लोगों को अपने प्रदेश में रहने देने की ख़िलाफ़त कर रहें। फ़िर हम कैसे मान लें। सरदार पटेल के विचारों को हमारा देश अपना मूलमंत्र बनाकर चल रहा है। इतना ही नहीं जब संविधान सभी को समान अवसर और स्वतंत्रता की बात करता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधनों पर सभी का बराबरी का हक होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य देखिए आज़ादी के सात दशक बाद भी ये सारी सुविधाएं समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को नहीं मिल पाई हैं। जिन्हें मिलती भी है, उसकी गुणवत्ता माशाल्लाह! आज के दौर में अच्छी शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य कमोवेश उन्हीं के लिए है, जिनकी जेब पैसों से लबालब भरी है। वही सूरतेहाल संसाधनों का भी है। यह सब कैसे और क्यों हुआ। इससे हम और आप तनिक भी अनभिज्ञ नहीं। फ़िर समाज तो कई स्तरों और मायनों में बंटा हुआ है। फ़िर हम कैसे कह दें, कि हमारी व्यवस्था सरदार जी के मूलमंत्र पर चल रहीं है। तत्कालीन दौर में शिक्षण संस्थान और आरक्षण जैसे विषय भी समाज को बंटाने का जरिया बनते जा रहे। फ़िर हम और हमारी व्यवस्था सरदार पटेल के देश को ले जाना किधर चाहती है। यह स्पष्ट होना मुश्किल होता जा रहा।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है, कि पटेल जैसा प्रशासक मिलना मुश्किल है। उनकी तुलना जर्मनी के सूत्रधार बिस्मार्क से की जाती है। पटेल जी को उनके अटल इरादें और दृढ़इच्छा शक्ति की वज़ह से लौहपुरुष कहा गया। आज़ादी के दौरान एक अंग्रेज द्वारा पूछने पर सरदार पटेल कहते हैं, कि हमारा देश बिखरने के लिए नहीं बना। आज उसी देश को हमारे सियासतदां ही अगर अपने सत्ताप्रेम के कारण विभिन्न तरीक़े से विभाजित करने में लगे हैं। तो यह बहुत दुःखद परिस्थिति है। सरदार पटेल सिर्फ़ देशी रियासतों को एकत्रित करने वाले ही नहीं, किसानों आदि के हिमायती भी रहें हैं। तो उनके विचारों पर अमल होना पहले ज़रूरी है, उनकी सिर्फ़ प्रतिमा बना देने से समाज का भला नहीं होने वाला।

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है, कि जाति-धर्म और ऊंच-नीच से हटकर आगे बढ़ने की बात सरदार पटेल जी ने स्वतंत्रता के वक्त कही थी। उस पर अमल हमनें और हमारी व्यवस्था ने आज़तक नहीं किया। जिस कारण हम उस वैश्विक दौर में पिछड़ेपन का शिकार बनें हैं। जब दुनिया दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश में लगी हुई है। वल्लभ भाई पटेल का कहना था, कि आज हमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए, लेकिन हम उस पर अमल आज तक नहीं कर पाएं हैं। हम आज जातियों के नाम पर ही नहीं बंट रहे, क्षेत्र, भाषा और आर्थिक रूप से बंटते जा रहें। इसके अलावा पटेल जी का एक विचार यह भी था, कि भारत एक अच्छा उत्पादक हो और इस देश में कोई अन्न के लिए आंसू बहाता हुआ भूखा ना रहे। आज क्या स्थिति है। इससे कोई अपरिचित नहीं, क्योंकि जब किसी प्रदेश के किसी हिस्से में किसी व्यक्ति की मौत भूख की वज़ह से होती है। तो उस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। इसके अलावा आज तो भुखमरी का शिकार देश का भविष्य यानी वर्तमान का नौनिहाल भी हो रहा। फ़िर कैसे मान लें। जो राजनीतिक परिपाटी सरदार पटेल जैसे महान पुरुषों के नामों को बेचकर अपनी राजनीति चमका रहीं। वह उनके विचारों का अनुसरण भी कर रही। आज आधुनिक होते भारत की जो दुश्वारियां है। वह नहीं होती, अगर महान पुरुषों के विचारों की अनुगामी हमारी सियासत बनती तो। सरदार पटेल जी ने कहा था, जब तक वे दिल्ली में रहें। उनके घर वाले दिल्ली से दूर रहें, लेकिन आज तो पूरा का पूरा परिवार ही राजनीतिक अखाड़े में दमख़म दिखाता है। फ़िर क्या कहें कैसी देश सेवा और समाजसेवा हो रहीं, और कैसे सरदार पटेल के विचारों का अनुसरण।

आज यदि भारत जीवंत सहकारिता क्षेत्र के लिए जाना जाता है, तो इसका श्रेय भी सरदार पटेल को जाता है। सरदार पटेल ग्रामीण समुदायों, विशेषकर महिलाओं को सशक्त बनाने के साथ किसानों और मजदूरों के हक़ के लिए सदैव मुखर रहें। तो आज जिस दौर में सामाजिक असमानता बढ़ रहीं, शिक्षा सामाजिक उन्नयन का माध्यम नहीं बन पा रहीं। देश जाति-धर्म में बंट रहा। वैसे परिवेश में सरदार जी के विचारों को महत्व दिया जाना ज़रूरी है। प्रतिमा निर्माण से पर्यटन को बढ़ावा दिए जाने के साथ हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सरदार पटेल से रूबरू करा सकते हैं, लेकिन ग़रीबी आदि दूर नहीं कर सकते। तो अब आवश्यकता है, हमारे सियासतदां सरदार पटेल के विचार को भी महत्ता दें। तभी देश सशक्त और सुदृढ बन पाएगा। आख़िर में सरदार पटेल के एक विचार से बातें ख़त्म करने का प्रयास करता हूँ। सरदार पटेल जी का कहना था, कि जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। तो ऐसे में जिस ऐसे परिवेश में वर्तमान दौर में सियासतदां अवाम को नाना प्रकार से बांटकर स्वहित की पूर्ति में लगें है। तो अवाम को समझना होगा, और जात-पांत के ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सबको एक होना पड़ेगा। जिससे की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे योग्य और अनुभवी सियासतदां संसद का प्रतिनिधित्व कर सकें, जो देश और समाज का सकल और समावेशी विकास कर सकें।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896