लघुकथा – समन्वय

रोज की तरह आज भी सैर के समय वह व्यक्ति मिला. यहां कोई ”नमस्ते” या ”राम-राम” समझने वाला तो है नहीं, सो अपनी आदत के मुताबिक मैंने उसे ”गुड मॉर्निंग” कहा. पर यह क्या! मुझे खुद पर ही आश्चर्य हुआ. कहा तो मैंने ”गुड मॉर्निंग”, पर मेरे हाथ ”नमस्ते” की मुद्रा में जुड़े हुए थे. भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का यह अद्भुत समन्वय कैसे हो गया!
यों तो समन्वय के मेरे प्रशिक्षण की श्रंखला अत्यंत सुदृढ़ है. जे.बी.टी. में समन्वय, बी.एड. में समन्वय, एम. एड. में समन्वय, घर में समन्वय, बाहर समन्वय, रिश्तों में समन्वय, लेखन में समन्वय, यानी हर जगह समन्वय, फिर भी ऐसा समन्वय कभी नहीं हुआ. स्मृति पर तनिक जोर देते ही मुझे याद आया.
आज सुबह घर पर अश्विनी आई थी. अश्विनी यानी समन्वय की साकार प्रतिमा. लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली अश्विनी भारतीय मूल के माता-पिता की संतान. माता-पिता की मातृभाषा मलयालम, सो अश्विनी को मलयालम का भी अच्छा ज्ञान है. दक्षिण भारत की होते हुए भी हिंदी का ज्ञान बहुत जरूरी है, सो हिंदी सीखी. फिर बचपन फिजी में बीता. फिजी में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है हिंदी, सो हिंदी में भी पारंगत. शिक्षा का माध्यम इंग्लिश रहा, सो इंग्लिश में भी नंबर वन. पतिदेव यूनान के सो ग्रीक भाषा में भी निपुणता. बोलने में भाषा की स्पष्टता के साथ अत्यंत विनम्रता का समन्वय भी अश्विनी की विशेषता है.
अपने काम से आई हुई अश्विनी सिर्फ़ दो मिनट हमारे घर रुकी. उसकी ”नमस्ते आंटी” बोलने के लहजे की स्पष्टता ने ही मुझे प्रभावित कर दिया था.
समन्वय की ऐसी साकार प्रतिमा से मिलना ही संभवतः मेरे ”गुड मॉर्निंग” में भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का वह अद्भुत समन्वय स्थापित कर गया था.

                                                                                                 

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।