लघुकथा

लघुकथा – भारती कौन?

”भारती कौन?”
”सुदर्शन की कहानी हार की जीत के बाबा भारती? बाबा भारती एक साधु, जिनके सुंदर-सुघड़-बांके घोड़े का नाम सुलतान था. घोड़े पर इतनी आसक्ति, कि डाकू खड़गसिंह के डर से उनकी सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी. लेकिन गरीबों के मसीहा. उन्होंने डाकू खड़गसिंह को भी सीधी राह पर चलने को विवश कर दिया.”
”नहीं वो भारती नहीं.”
”तो फिर कौन से भारती?”
”दिल्ली के ”भारती आई फाउंडेशन” के सुप्रसिद्ध नेत्र सर्जन डॉक्टर भारती.”
”क्या वे भी गरीबों के मसीहा हैं?”
”हां, उन गरीबों के मसीहा, जो अपनी आँखों में हो रही परेशानियों के बारे में जानते तो थे, मगर उनके इलाज के बारे में अधिक ज्ञान नहीं था और न ही उन्हें कोई ज्ञान देने वाला था.”
”तो क्या वे उन्हें ज्ञान देते हैं?”
”जी हां, वे उन्हें ज्ञान भी देते हैं, सलाह भी देते हैं, ऑपरेशन भी करते हैं और चश्मे भी देते हैं, वो भी बिना किसी खर्च के.”
”मगर कहां?”
”जहां बुलाओ वहां, जब बुलाओ तब. फिलहाल वे 12 साल से हर साल दिसंबर के तीसरे रविवार को अपनी टीम सहित ”लालीबाई जगदीश रानी चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित नेत्र जांच शिविर में उपस्थित होते हैं और लगभग 1000 लोगों के नेत्रों की जांच करते हैं. अन्य अनेक मंचों से भी डॉक्टर भारती जुड़े हुए हैं.”
”आज डॉक्टर भारती जैसे गरीबों के मसीहा भले ही कम मिलते हैं लेकिन मिलते हैं, तभी तो यह धरती अपनी धुरी पर टिकी हुई है.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

3 thoughts on “लघुकथा – भारती कौन?

  1. लीला बहन , बाबा भारती का चित्रं बहुत ख़ूबसूरती से किया . डाक्टर भारती जी को मेरा बिग सैलिउट . सही कहा आप ने की ऐसे लोगों की वजह से ही धरते एक धुरी पर अटकी हुई है .

    1. गुरमैल भाई जी, हम सुदर्शन जी को कह देंगे, कि डॉक्टर भारती जी तक आपका बिग सैल्यूट पहुंचा दें. सचमुच ऐसे परोपकारी लोगों की वजह से ही धरती अपनी धुरी पर टिकी हुई है. सुदर्शन भाई भी 12 साल से इस परोपकार में सपरिवार अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

  2. इस लघुकथा की प्रेरणा हमें सुदर्शन खन्ना के ब्लॉग ”तीसरा रविवार” से मिली. उसमें हमने लिखा था-
    प्रिय ब्लॉगर सुदर्शन भाई जी, यह तीसरा रविवार भी खूब रहा. सचमुच वह जगह पुण्य स्थली है, जहाँ इस तरह के आयोजन होते हैं. हर स्वयंसेवक को अपनी-अपनी ड्यूटी दे दी गई थी और सभी अपनी जगह मुस्तैद. एक सुदर्शन की कहानी हार की जीत के बाबा भारती थे और एक सुदर्शन के ब्लॉग के डॉक्टर भारती, क्या संयोग है! दोनों अपनी जगह सुदर्शन नवयुग के प्रेरक. कितना अच्छा लगता है- किसी को कोई गरूर नहीं, किसी को कोई घमंड नहीं. सभी विनम्र भाव से सेवारत रहते हैं. बहुत सुंदर, पहले फोटोज़ और वीडियोज़ और अब यह विवरण. चलती-फिरती चित्रमय कामेंट्री, संतुष्टि और आत्मसंतुष्टि का मिला-जुला मंजर. धन्य हैं आप लोग. अत्यंत सुंदर, सटीक, रोचक व सार्थक ब्लॉग के लिए आभार.

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