संस्कृत अर्थ-साधक भी है

स्वामी वेदानन्द (दयानन्द) तीर्थ जी ने ‘हम संस्कृत भाषा क्यों पढ़ें?’ शीषर्क से एक पुस्तक लिखी है। इसका प्रकाशन ‘विरजानन्द वैदिक संस्थान, गाजियाबाद’ से सन् 1973 में हुआ था। पुस्तक में कुल 40 पृष्ठ हैं। यह पुस्तक की द्वितीयावृति थी और इसका मूल्य तब 60 पैसे था यानि एक रुपये से भी कम था। इस पुस्तक की भूमिका में स्वामी जी ने लिखा है कि कुछ एक संस्कृत प्रेमियों ने संस्कृत के प्रचार के लिए ‘विरजानन्द-संस्कृत-परिषत्’ नामक एक सभा की स्थापना कर रखी है। उसके कार्यों में संस्कृत भाषा के प्रचार-विस्तार के लिए परीक्षाओं का संनिवेश भी है। कार्यालयों में कार्य करने वाले, दुकानदार आदि ऐसे लोग जो पढ़ने के लिए वैतनिक अध्यापक रखने का सामर्थ्य नहीं रखते, किन्तु जिनकी रुचि संस्कृत भाषा सीखने की है, उन को इस ओर प्रवृत्त कराने के लिये परीक्षाओं के पाठ्यक्रम की ऐसी योजना योजित की गई है कि वे अपनी सुविधा के अनुसार घर पर किसी अध्यापक के सहयोग के बिना संस्कृत भाषा सीखकर उन परीक्षाओं में सम्मिलित हो सकें। उन परीक्षाओं में ‘हम संस्कृत क्यों सीखें’ यह एक विषय भी हैं। इस विषय पर हिन्दी में कोई उपयुक्त पुस्तक न होने से यह छोटी-सी पुस्तिका लिखी गई है। इस से जहां परिक्षार्थियों को लाभ होगा, वहां इतर लोगों की ज्ञान-वृद्धि में भी यह सहायक होगी। इस पुस्तक में पृष्ठ 14 पर स्वामी जी ने ‘संस्कृत अर्थ-साधक भी है’ शीर्षक से भी विचार प्रस्तुत किये हैं। हम पाठकों के लिये उनके वह उपयोगी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

वह लिखते हैं कि रही अर्थ की बात। उसके सम्बन्ध में भी सुन लीजिए। तनिक सा विचार कीजिए। मनुष्य जीवन में अर्थ ही सब कुछ नहीं है। ‘अर्थ कुछ नहीं’ जैसे यह विचार नगण्य है वैसे ही ‘अर्थ ही सब कुछ है’ यह विचार भी अज्ञान विलसित होने से हेय है। मनुष्य जीवन में अर्थ का एक विशिष्ट स्थान है, किन्तु सबसे प्रकृष्ट नहीं। जाने दीजिए, और सब बातों को, आप हम प्रतिदिन मिलते हैं, क्या अर्थ के लिए? यदि हम एक-दूसरे को न मिल पावें तो बेचैन हो जाते हैं। क्या अर्थ न मिलने से? इस एक उदारहण से सिद्ध होता है कि मानव जीवन में अर्थ ही सब कुछ नहीं है। किन्तु मैं आपके सन्तोष के लिए बताता हूं कि संस्कृत भाषा के अध्ययन से अर्थ सिद्धि भी होती है। इसे बताने से पूर्व यह कहना अनुचित न होगा कि अर्थ की कृच्छ्रता, धन की न्यूनता के कारण किसी संस्कृतज्ञ ने रेल गाड़ी के नीचे सिर देकर प्राण विसर्जन नहीं किये। किसी संस्कृताभ्यासी ने धनाभाव से दुःखी होकर मकान से छलांग लगाकर संसार की असारता अथवा वज्रसारता का प्रमाण नहीं दिया। अतः यह गंभीरता से विचारने की बात है कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय आत्महत्या करते देखे जाते हैं, संस्कृत पढ़ने वाले नहीं। बात बहुत सीधी है कि संस्कृत भाषा सादा व्यवहार और ऊंचे विचार के सिद्धान्त की पोषक है। इसके विपरीत पाश्चात्य शिक्षा-दीक्षा भोग विलास की भावना को जागरूक करती है। अस्तु। यह तो प्रसंगानुप्रसक्त बात थी।

अब पुनः प्रकृत विषय पर आयें। संस्कृत पढ़ने से अर्थ की सिद्धि भी होती है। देखिए-यह तो बताया ही जा चुका है कि संस्कृत वाले अर्थाभाव के कारण आत्मघात करते नहीं सुने गये। इसलिए संस्कृत भाषा को अपनाने से अर्थ में क्षति पहुंचेगी, यह बात तो बनती दीखती नहीं। अर्थ की सिद्धि की बात लीजिए। संस्कृत पढ़कर अध्यापक, उपदेशक (व पुरोहित) बनने वाले को अर्थ के साथ मान-प्रतिष्ठा भी प्रचुर मिलती है। इसके अतिरिक्त संस्कृत के ग्रन्थों के अनुवाद, उनके आधार से नये ग्रन्थों का निर्माण करके प्रचुर मात्रा में अर्थ प्राप्ति की सम्भावना है। सरकार के पुरातत्व विभाग में संस्कृत वालों की बहुत पूछ हैं।

स्वामी जी के विचार महत्वपूर्ण हैं। हमारे वेद आदि सभी धर्म एवं संस्कृति के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है। अतः हमें इस भाषा का ज्ञान होना चाहिये। हम अंग्रेजी, हिन्दी व अन्य भाषाओं को पढ़कर किसी भी प्रकार से आजीविका प्राप्त क्यों न करें परन्तु हमें सभी कामों से कुछ समय निकाल कर संस्कृत अध्ययन पर ध्यान देना चाहिये। इससे हमें स्वाध्याय व ज्ञान प्राप्ति में लाभ होगा। इसके साथ आर्य होने के नाते हमें समाज से अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियां व सामाजिक असमानता आदि को दूर करने में भी अपनी भूमिका निभानी चाहिये। यदि हम ऐसा करते हैं तो इससे देश व समाज को लाभ होने से हमारा जीवन भी सार्थक होगा। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।