लघुकथा – हसीन ख़्वाब

मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, कि एक नया अवसर इतने नये अवसरों का जन्मदाता हो सकता है. आज एक पुराना कागज हाथ में क्या आया, यादों का दरीचा खुल गया था.
रात के करीब दस बजे भारत सरकार के एक अधिकारी का फोन आया-
”मैडम, आप कलकत्ते चलना चाहेंगी?”
”कब?”
”कल.”
”कितने दिनों के लिए?”
”एक सप्ताह के लिए.”
”पर यह सब कैसे संभव होगा? मेरे पास न टिकट है, न स्कूल को सूचित किया है. पता नहीं मुझे छुट्टी मिल पाएगी या नहीं?”
”उसकी आप चिंता न करें. भारत सरकार का सेमीनार है, आपको ऑन ड्यूटी जाने की परमीशन मिल जाएगी. आपको प्रोग्राम अभी बताना होगा.”
”ठीक है सर, मैं दस मिनट में आपको फोन करके बताती हूं. पहले घर से परमीशन लेनी होगी.”
”ठीक है.” और फोन कॉल खत्म हो गई थी.
आनन-फानन पति और बच्चों ने न केवल जाने की अनुमति दी, यह कहकर प्रोत्साहित भी किया- ”ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता, फोन करके हां कह दो और जाने की तैयारी करो. हम पीछे सब अपने आप संभाल लेंगे.”
आराम से स्कूल से भी लिखित अनुमति मिल गई थी. फिर एक सप्ताह का शानदार सेमीनार, प्रेस कॉन्फ्रेस, वहां रेडियो अफसरों से मुलाकात की बदौलत आते ही रेडियो प्रोग्रामस से जुड़ने का अवसर मिलना, गायक कलाकारों से मिलने पर फिल्म के लिए पार्श्वगायन का अवसर मिलना, अकादमी के अधिकारियों से मुलाकात के कारण कवि सम्मेलनों और सेमीनारों का अवसर, शीघ्र ही अकादमी की आर्थिक सहायता से छपना आदि ऐसे ही स्वर्णिम अवसर थे, जो उस एक प्रोग्राम के कारण मिल सके थे. 30 साल बाद भी यह सिलसिला अभी तक जारी है.
उस पुराने कागज ने उस हसीन ख़्वाब की यादें ताजा कर दी थीं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।