इज्जत

लाख करो टुकड़े सोने के उसकी क़ीमत उतनी है ,
नारी की होती इज़्ज़त जिस घर में उसकी क़ीमत दुगनी है ।
लाख करो —–

पावन बन जाती जलधारा जो गंगा में
मिलती है ,
सत्य मार्ग के अनुगामी मानव को इज़्ज़त
मिलती है ।
मात- पिता का भक्त श्रवण था उसकी महिमा जितनी है ,
करते जो माँ बाप इज़्ज़त उनकी इज़्ज़त दुगनी है ।
लाख करो —–

भरी सभा में द्रुपद सुता की लाज बचायी
थी जिसने ,
खा कर जूठे बेर भीलनी को इज़्ज़त दी
थी जिसने ।
वेद ग्रन्थ वाणी गाती महिमा नारी की
जितनी है
नारी के सम्मान की रक्षा सबको करनी
दुगनी है ।
लाख करो ——-

रानी लक्ष्मी ने झाँसी का मान बढ़ाया था कितना ,
राणा ने हल्दीघाटी में शौर्य दिखाया था जितना ।
वीर शिवाजी की गाथायें आज भी पावन
जितनी है ,
भारत माँ की इज़्ज़त हर बच्चे को करनी
दुगनी है ।
लाख करो —–

डा० नीलिमा मिश्रा
स्वरचित

परिचय - डॉ नीलिमा मिश्रा

जन्म एवं निवास स्थान इलाहाबाद , केन्द्रीय विद्यालय इलाहाबाद में कार्यरत , शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मध्यकालीन भारत विषय से एम० ए० , राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से पी०एच० डी० । अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागिता विशेष रूप से १६वां विश्व संस्कृत सम्मेलन बैंकाक २०१५ । विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में लेख गीत गजल कविता नज़्म हाइकु प्रकाशित इसके अलावा ब्लाग लिखना ,गायन में विशेष रुचि