लघुकथा – लक्ष्य पर ध्यान

आज सुबह-सुबह स्वामी विवेकानंद का एक सुविचार पढ़ने को मिला-
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत.”
अर्थात् उठो, जागो, और ध्येय की प्राप्ति तक रुको मत.
इस सुविचार से स्वामी विवेकानंद से संबंधित एक किस्सा याद आ गया.
”बच्चों, तुम क्या कर रहे हो?” स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में भ्रमण करते समय पुल पर खड़े कुछ लड़कों को कुछ करते देखकर कहा.
”हम नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाने की कोशिश कर रहे हैं, पर किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा.”
”मैं कोशिश कर सकता हूं?” स्वामी विवेकानंद ने पूछा.
”अवश्य स्वामी जी.” लड़कों ने कहा.
उन्होंने एक लड़के से बन्दूक ली और निशाना लगाने लगे. उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा, फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाए. सभी बिलकुल सटीक लगे.
”स्वामी जी, भला आप ये कैसे कर लेते हैं? आपने सारे निशाने बिलकुल सटीक कैसे लगा लिए?” हैरान हुए लड़कों ने उनसे पूछा –
”असंभव कुछ भी नहीं है. तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ. अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए. तब तुम कभी चूकोगे नहीं. यदि तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो.” स्वामी विवेकनन्द जी बोले.
लक्ष्य पर ध्यान देने का पाठ उन लड़कों के लिए एक वरदान था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।