ग़ज़ल

अब दिल में कोई और बसाया न जायेगा ,
क़ल्बों जिगर से अक्स मिटाया न जायेगा !

चाहेंगे जिस्म-ओ-जॉ की तरह उम्र भर मगर ,
है इश्क़ आपसे ये जताया न जायेगा !

आँखों में अश्क दिल में चुभन हिज्र बेख़ुदी ,
हम से तो ये अज़ाब भुलाया न जायेगा !

ऐ अशिकान-ए-नज़्म यूँ इसरार मत करो ,
मजरूह दिल से नज़्म सुनाया न जायेगा !

ऐ इश्क़ कोई राह-ए-सुकूँ मुझको दिखा दे ,
गार-ए-अलम में उम्र बिताया न जायेगा !

हम लाख शिद्दतों से इबादत करें मगर ,
हम से तो रब का क़र्ज़ चुकाया न जायेगा !

वो जिसकी ख़ाहिशात पे दुनिया लुटा दिया ,
कहता है नाज़-ए-इश्क़ उठाया न जायेगा !

जलती रहेगी यूँ ही तेरी राहों में वफ़ा ,
लेकिन चरागे इश्क़ बुझाया न जायेगा !

हर ज़ाविये से सोचा ‘वफ़ा’ ने ये तय किया ,
अब बे-वफ़ा पे अश्क़ बहाया न जायेगा !

कविता सिंह “वफ़ा”