धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

उपासना किसकी, क्यों व कैसे करें?

अध्यात्म विज्ञान में उपासना का महत्व सर्वोपरि हैं। उपासना पास बैठने को कहते हैं। किसके पास बैठना है, इसका उत्तर हम विचार करके प्राप्त कर सकते हैं। माता-पिता के पास बैठने से उनसे अनेक सांसारिक, पारिवारिक व धर्म विषयक बातों को ज्ञान होता है। आचार्य के पास बैठने से अपने अध्ययन के विषयों सहित धर्म व कर्तव्यों का ज्ञान होता है। इसी प्रकार से समाज में वृद्ध व अनुभवी पुरुष होते हैं, ऐसे भी होते हैं जो अधिक आयु के नहीं होते परन्तु जिनके पास ज्ञान व ऐसे क्षेत्रों का अनुभव होता है जो कि हमारे पास नहीं होता। अतः इन सबसे हम कुछ न कुछ ज्ञान व अनुभव जान सकते है व उन्हें सीख सकते हैं। यह ज्ञान व अनुभव ही हमें अपने जीवन में अनेकानेक प्रकार से लाभप्रद होते हैं और इनसे हम दूसरों का भी उपकार कर सकते हैं। इन माता, पिता व आचार्य आदि से अलग एक सत्ता और है जिसे ईश्वर कहते हैं। उस ईश्वर ने ही यह सृष्टि हमें सुख देने व कर्म करने के लिए बनाई है। वह ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर की यह सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक होने से हमें आंखों से दिखाई नहीं देती। इस कारण प्रायः सभी लोग ईश्वर के अस्तित्व को समझने में भूल करते हैं। वेद व वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय या फिर वैदिक विद्वानों के उपदेशों से ही मनुष्य ईश्वर के सत्य स्वरूप व गुण, कर्म, स्वभाव आदि से परिचित होता है। ईश्वर से परिचय हो जाने पर भी स्वाध्याय एवं सन्ध्या अर्थात् ध्यान एवं चिन्तन-मनन आदि से ईश्वर विषयक अपने ज्ञान को बढ़ाना होता है। जब हम ईश्वर विषयक स्वाध्याय, चिन्तन-मनन, ध्यान, उसकी स्तुति व प्रार्थना, ईश्वर के मुख्य और निज नाम ओ३म् का जप, गायत्री मन्त्र का जप व अग्निहोत्र-यज्ञ आदि कर रहे होते हैं तो इसी को उपासना कहा जाता है। इसका कारण यह है कि ईश्वर सर्वव्यापक व सर्वान्तयामी होने से हमें सदा सर्वदा उपलब्ध व समीपस्थ प्राप्त रहता है। यदि हमारा ईश्वर में ध्यान नहीं है तो वह उपासना नहीं होती और यदि हम ईश्वर में ही अपने मन को एकाग्र कर स्वाध्याय, चिन्तन-मनन, ध्यान व स्तुति-प्रार्थना आदि करते हैं तो यह उपासना कहलाती है।

उपासना हमें उसकी व उनकी करनी चाहिये जिनमें सबसे अधिक गुण हैं और जिनके हमारे उपर सबसे अधिक उपकार हैं। ऐसी सत्ता जिसके हम पर सबसे अधिक उपकार हैं, उसका नाम ईश्वर है। हमने ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का उल्लेख किया है जिससे ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में उपासना करने योग्य सिद्ध होता है। उपर्युक्त ईश्वर के गुणों में एक गुण यह भी है कि वह हमें सत्य मार्ग, ज्ञान मार्ग, उन्नति के मार्ग और मृत्यु से अमृत की ओर जाने वाले मार्ग पर चलने की प्रेरणा करता है। वह हमें अनेक संकटों व दुःखों से बचाता भी है। हमारे पास जो ऐश्वर्य व धन आदि पदार्थ हैं वह सब ईश्वर के हैं। सभी धनों का स्वामी ईश्वर ही है। ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र में ‘कस्यस्वित् धनम्’ कहकर प्रश्न किया है कि यह धन किस का है? इसका उत्तर भी उसमें निहित है कि यह सब धन सुखस्वरूप परमात्मा का है। ईश्वर की उपासना करने से हम कृतघ्नता के पाप से बचते हैं। हमारी बुद्धि पवित्र होती है। हम ज्ञानवान होते हैं। अज्ञान व अन्धविश्वासों से बचते हैं। हम निरोग रहते हैं और हमारी आयु में भी वृद्धि होती है। ईश्वर हमारे शत्रुओं से भी हमारी रक्षा करता है। उपासना में मस्तिष्क, बुद्धि, मन व आत्मा को एकाग्र करने के अतिरिक्त कोई व्यय होता है, मात्र ईश्वर का दिया हुआ समय ही लगता है, इससे हानि कुछ नहीं होती और लाभ इस जन्म सहित परजन्मों में भी प्राप्त होते हैं। अतः ईश्वर की उपासना, वेदों में वर्णित ईश्वर के स्वरूप का स्वाध्याय व चिन्तन, ओ३म् व गायत्री जप सहित नित्य अग्निहोत्र आदि करके करनी चाहिये। सन्ध्या करने की उपयुक्त विधि योग दर्शन की विधि ही है।

उपासना परमात्मा की करनी उचित हैं। माता-पिता, आचार्य, विद्वान अतिथि व ज्ञानी लोगों की भी संगति व उपासना कर सकते हैं। इससे भी हमें अनेक लाभ होते हैं जिनका उल्लेख हम पहले कर आये हैं। अब प्रश्न होता है कि ईश्वर की उपासना क्यों करनी चाहिये? यद्यपि इसका उत्तर भी पूर्व आ चुका है फिर भी यह जानना आवश्यक है कि ईश्वर के हमारे ऊपर अनेक उपकार कौन-2 से हैं? ईश्वर ने हमारे लिये सृष्टि बनाई, हमें पूर्व जन्मों के वृद्ध, रुग्ण व जर्जरित शरीरों से मुक्त कर नया शरीर, माता-पिता, भाई-बहिन आदि प्रदान किये, वेदों का ज्ञान ऋषियों के माध्यम से हम तक पहुंचाया, वही परमात्मा आज भी वायु को बहा रहा है, जल को वाष्प बना कर आकाश में ले जाता है और वहां से वर्षा होती है जिससे अन्न, फल व ओषधियां आदि उत्पन्न होती हैं। हम जल पीते हैं और नाना प्रकार से जल का उपयोग करते हैं। परमात्मा ने गाय व अन्य दुग्ध देने वाले पशु हमारे लिये ही बनाये हैं। यह सब काम परमात्मा हमारे लिये कर रहा है। अतः उसकी उपासना कर उसका द्वारा धन्यवाद करना हमारा कर्तव्य बनता है। उपासना करना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने सहित इससे अन्य अनेक लाभ भी होते हैं। इन लाभों का वर्णन भी हम ऊपर कर चुके हैं। स्वयं चिन्तन व मनन कर भी हम ईश्वर के अनेकानेक उपकारों को जान सकते हैं। अतः ईश्वर की उपासना का आधार भी हमें समझ आ गया है।

उपासना कैसे करें? इसके लिये हमें सन्ध्या की वैदिक विधि का अध्ययन करना चाहिये। यह एक लघु पुस्तक है और इसके लिए थोड़े से मन्त्रों का विधान किया है जिनका उच्चारण कर व उनके अर्थों पर विचार कर हमें ईश्वर का ध्यान व धन्यवाद करना होता है। सन्ध्या विधि के अध्ययन के साथ हमें योग दर्शन व सांख्य दर्शन का अध्ययन भी करना चाहिये। सन्ध्या व अष्टांग योग उपासना में दोनों ही उपयोगी हैं और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। योग दर्शन में उपासना की विधि नहीं है। ऋषि दयानन्द जी ने उपासना वा सन्ध्या की विधि लिख कर इस अभाव की भी पूर्ति कर दी है। वस्तुतः सन्ध्या ग्रन्थ को योगदर्शन का एक पूरक ग्रन्थ भी कह सकते हैं। सन्ध्या में मन लगे इसके लिये हमें प्रतिदिन वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय भी अवश्य करना चाहिये। हमारा भोजन शुद्ध व पवित्र होना चाहिये। हमारा आचरण, व्यवहार व व्यवसाय भी पूर्णतः पवित्र होना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों सहित आर्य विद्वानों की वेदमंजरी, ऋग्वेद ज्योति, यजुर्वेद ज्योति, अथर्ववेद ज्योति, स्वाध्याय सन्दोह, श्रुति सौरभ, सन्मार्ग दर्शन आदि अनेक ग्रन्थ स्वाध्याय के लिये बहुत ही उत्तम ग्रन्थ हैं। ऋषि दयानन्द से पूर्व और महाभारत के बाद तो इन ग्रन्थों का सर्वथा अभाव था। इस दृष्टि से हम व आज की पीढ़ी सौभाग्यशाली है जिसे आज इतना वैदिक साहित्य आर्यभाषा हिन्दी में उपलब्ध है। यह साहित्य इतना है कि सारा जीवन पढ़े तो भी शायद समाप्त न हो। अतः स्वाध्याय की आदत डालनी चाहिये। स्वाध्याय से भी सन्ध्या से होने वाले अधिकांश लाभ प्राप्त होते हैं। सन्ध्या के लिये स्वाध्याय की अनिवार्यता है। यदि स्वाध्याय रहित सन्ध्या होगी तो परिणाम उतने महत्वपूर्ण व लाभप्रद शायद न हों जो प्रतिदिन घंटो स्वाध्याय करने वालों को होते हैं। स्वाध्याय के साथ ईश्वर विषयक चिन्तन भी आवश्यक है जिससे हमारा ध्यान ईश्वर में स्थिर हो जाये और बाहर के विषय सन्ध्या करते समय हमारे मन में न प्रवेश करें। स्वाध्याय से इन सब बातों को जाना जा सकता है। सन्ध्या ऋषि दयानन्द द्वारा प्रणीत सन्ध्या विधि पुस्तक की विधि से ही करनी चाहिये। ऐसा करने से अवश्य ही उपासना से होने वाले सभी लाभ उपासक व साधक को प्राप्त होंगे। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।  

 –मनमोहन कुमार आर्य