बेटियां

हमारी बेटी के जन्मदिन पर उसकी सभी सहेलियां सपरिवार आई हुई थीं. बसंती की 80 साल की सासू मां शकुंतला भी उनके पास ऑस्ट्रेलिया आई हुई थीं, हमने उनको भी लाने के लिए उसको विशेष रूप से कह दिया था. सभी बुजुर्गों की तरह वे भी ना-नुकुर कर रही थीं-
”आप सब बच्चों के बीच मैं क्या करूंगी जाकर, आप लोग जाइए.”
बहू न मानी- ”ममा, आप ही तो कहती हैं- बच्चे-बूढ़े बराबर होते हैं.”
”बसंती मेरे कान बंद हैं, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा, मैं चलकर क्या करूंगी?”
”ठीक है ममा, फिर सुबह मैं आपको पहले डॉक्टर के पास ले जाऊंगी.” वह पार्टी में आने से पहले सासू मां के कान साफ करवाकर आई थी. यह सब शकुंतला ने ही मुझे बताया था.
स्वभाव से शांत-सौम्य दिखने वाली शकुंतला अपनी तीनों बहुओं की तारीफ करते फूली नहीं समा रही थीं. ”जैसी मेरी बसंती है, वैसी ही मेरे अमेरिका वाली बहू श्वेता और भारत वाली हरिता भी हैं. तीनों एक से बढ़कर एक हैं.”
”पड़ोसिनें कहती थीं, तीन बेटों की मां हो, देखना सब सोचेंगे वो संभालेगा, वो संभालेगा और तुम्हें कोई पूछेगा भी नहीं. पर सच बताऊं इन तीनों बहुओं ने मेरी इतनी सार-संभाल ली है, कि कोई क्या लेगा? भगवान ऐसी बेटियां सबको दे.”
”तिरंगे झंडे के तीन रंगों के नाम वाली तुम्हारी बेटियां हैं, तुम उनकी भारतमाता हो.” मैंने कहा था.
”आपने सच कहा है, मैं भी मां की तरह इनके साथ व्यवहार करती हूं. ये अपने बच्चों को कुछ भी करें, कुछ भी कहें, मैं बीच में नहीं बोलती. हमने भी तो अपनी मर्जी से अपने बच्चे पाले, इन्हें भी पूरी आजादी मिलनी चाहिए.”
तभी हमारी बेटी ”ट्रिपल संडे” आइसक्रीम ले आई, जो तिरंगे के रंगों से सुसज्जित थी. 26 जनवरी जो आने वाली थी. उस दिन भारत का गणतंत्र दिवस भी होता है और ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय दिवस ऑस्ट्रेलिया डे भी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।