उगालदान

अपने नाम के अनुरूप चंद्रिका-सी शांत-शीतल इंदु कभी-कभी रौद्र रूप भी धारण कर लेती थी. सखी के साथ सैर करते हुए प्रसंगवश उसे अपने ऐसे ही एक 50 साल पहले के रौद्र रूप की स्मृति हो आई थी.
”बिलकुल ठीक बात है, संगति ही तारती है और संगति ही डुबोती है. इसका ज्वलंत उदाहरण मेरी ममी हैं.” तनिक सांस लेकर वह बोली- ”बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी. मम्मी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं और मैं कॉलेज में पढ़ रही थी. भाई-बहिनों में मैं ही सबसे बड़ी थी, इसलिए घर में मेरा दबदबा था.”
”बिलकुल मेरी ही कथा कह रही हो क्या?” सखी ने कहा.
”हो सकता है. एक दिन मैं कॉलेज से जल्दी आ गई. क्या देखती हूं, कि पड़ोस वाली आंटी आई हुई थीं, ममी और आंटी गेहूं साफ कर रही थीं और अपने ससुराल पर भड़ांस निकालती हुई रोए जा रही थीं. उनको मेरे आने का भी पता नहीं चला. मैं चुपके-से कमरे में दाखिल हो गई और उनकी बतकहियां सुनने लगी.”
”मेरे सहुरे ने ऐसे-ऐसे जुल्म किए, कि क्या बताऊं?” आंटी का कहना था.
”मेरे सहुरे ने भी ऐसा ही किया था.” यह ममी की आवाज थी.
इंदु को आंटी की बात तो नहीं खली, लेकिन ममी की बात उसे नागवार गुजरी. 18 साल तक ममी की ऐसी बात कभी नहीं सुनी थी. वे मेरी तरह शांत रहती थीं और हर एक के गुण ही देखती थीं. आज अचानक क्या हुआ?”
इंदु ने ममी को इशारे से कमरे में बुलाया और कहा- ”ममी, आज तक तो दादाजी में आपको गुण ही दिखते थे, आज आंटी की बात सुनकर आप यह नया राग कैसे अलाप रही हैं और रोए भी जा रही हैं? आज से आंटी का घर में आना बंद है, आगे से ऐसा मेला लगा, तो मैं पापा से शिकायत कर दूंगी. आप आंटी की उगालदान हैं क्या? जो वो उगलेंगी, आप ग्रहण करती जाएंगी? ममी बाहर आईं, तो आंटी जा चुकी थीं. उस दिन के बाद ममी को न तो सहुरे से कोई शिकायत रही, न घर में वैसा मेला ही लगा.”
इंदु के शांत-सौम्य मुखमंडल पर आज भी उस रौद्र रूप की छाया झलक रही थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।