लघुकथा

विकल्प

बीस साल जेल की सजा काटने के बाद आज पुष्कर जेल से आजाद था, फिर भी वह वापिस जेल में शेष जीवन व्यतीत करना चाहता है, क्योंकि उसको इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं मिल पा रहा है. जेल की ओर वापिस चलते-चलते भी उसके मन का गहन मंथन जारी है.
”मैंने अपनी प्यारी पत्नी और बीस साल की लाड़ली बेटी की हत्या कर दी थी”. ”दोनों मेरी हर बात मानती थीं. फिर आखिर उनका दोष क्या था? दोष तो मेरा ही था. उस रात न जाने किस वहशीपन ने मुझे वशीकरण मंत्र से वशीभूत कर दिया था”.
”अब न घर रहा, न घरवाली और न घर की इकलौती वारिस. और गांव? गांव ही कहां रह गया है? जुलाई 2016 में आई भीषण बाढ़ में सब तबाह हो गया. अब गांव भुतहा हो गया है. पूरे गांव में सिर्फ वह ही एकमात्र जीवित व्यक्ति बचा है”.
”इससे तो अच्छा वही उधम सिंह नगर की सितारगंज जेल है, जहां उसने अपनी उम्र के सबसे अच्छे पड़ाव वाले बीस वर्ष गुजारे हैं”.
तभी अचानक उसे बचपन में सुनी कहानी ”फिर चुहिया की चुहिया” याद आई. आज वह भी तो यही करने जा रहा है.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “विकल्प

  • लीला तिवानी

    कभी-कभी इंसान परिस्थितियों के आगे इतना विवश हो जाता है, कि उसे जेल के अलावा कोई विकल्प ही नहीं दिखता. यह दीगर बात है, कि जेल वाले उसे स्वीकार करेंगे या नहीं!

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