दिलखुश जुगलबंदी-7

एक वैलेंटाइन यह भी

न जाने कहाँ से इक ख्याल आया,
ख़ामोशी से शब्दों को था पिरोया,
बहती हवा में शब्द लहराते चले गए,
दिलखुश जुगलबंदी सृजित करते चले गए.

खामोशी का तरन्नुम कुछ निराला है,
वही समझ सकता है, जो मौन का मतवाला है,
इसी मौन के तरन्नुम ने रच डाले हैं कई तराने,
इन्हीं तरानों ने दिल को खुश कर डाला है.

ख़ामोश शब्द आप तक पहुंच गए
बिना लिफाफे बिना डाकिए के
हवाओं में लहराते जज्बातों को
पढ़ लिया था पैग़ाम भेजा था जिनको

ख़ामोश शब्द अक्सर गंतव्य तक पहुंच ही जाते हैं,
कभी-कभी खुद को पता नहीं चलता, सामने वाले भांप जाते हैं,
इनको लिफाफे या डाकिए की जरूरत नहीं पड़ती,
हवाओं में लहराते जज्बातों को कबूतर ही उड़ा ले जाते हैं.

ये परिंदे भी कमाल की शै हैं
खामोशियों की सिसकियां
सुन लेते हैं
बिन कहे ही फिर
भरते हैं लम्बी उड़ान
जा पहुंचते हैं
ठिकाने पर
रख पैग़ाम अपने परों पर.

इन परिंदों के पर (पंख) भी तो निराले होते हैं,
हमारे पर (लेकिन-किंतु-परंतु) की तरह रुकावट वाले नहीं होते हैं,
एक बार तो 23 साल बाद भी ख़त को मंजिल तक पहुंचा दिया था,
तभी तो उमंग में आकर ‘कबूतर जा-जा-जा’ गाते हैं,
और वेलेंटाइन डे पर पहले प्यार की पहली चिट्ठी पहुंचाते हैं.

परिंदे और उनके पर
दोनों ही निराले हैं
मतवाले हैं
ज़िन्दगी से कभी नहीं
दुःखी होते ये
एक पर ‘ गर
कट भी जाए
तो भी हारते नहीं
उड़ते ही जाते हैं
चाहे लगें 23 साल
इंसान तभी आगे बढ़ता है
जब उसके ‘पर’ काट दिए जाएं
तब शायद
उसके मन का कबूतर भी
कबूतर जा जा जा
वाला बन जाए
और
वेलेंटाइन डे पर
पहले प्यार की
पहली चिट्ठी
मंजिल तक
पहुंचा दे.

तब बोलती खामोशियां भी
मुखर हो जाएंगी
एक वैलेंटाइन यह भी
कहकर गीत गाएंगी.

 

दिलखुश जुगलबंदी- 5 के कामेंट्स में सुदर्शन खन्ना और लीला तिवानी की काव्यमय चैट पर आधारित दिलखुश जुगलबंदी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।