देवभाषा व राष्ट्रभाषा के प्रति क्रान्तिकारी वीर सावरकर के अमूल्य विचार

“संस्कृतनिष्ठ हिंदी जो संस्कृत से बनायी गयी है और जिसका पोषण संस्कृत भाषा से हो, वह हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। संस्कृत भाषा संसार की समस्त प्राचीन भाषाओं में सब से अधिक संस्कृत और सब से अधिक सम्पन्न होने के अतिरिक्त हम हिंदुओं के लिए सब से अधिक पवित्र भी है। हमारे धर्मग्रन्थ, इतिहास, तत्वज्ञान और संस्कृति, संस्कृत भाषा से इतनी अधिक परस्पर मिली हुई है और इसके अंतर्भूत है कि यही हमारी हिंदू जाति का वास्तविक मस्तिष्क है। हमारी अधिकांश मातृ-भाषाओं की यह माता है, इस ने उन्हें अपने वक्ष का दूध पिलाया है। आज हिंदुओं की समस्त भाषाएं जो या तो संस्कृत से ही निकली हैं या उसमें दूसरी भाषा मिला कर बनायी गयी हैं, वे सब तभी उन्नत और संवृद्ध हो सकती हैं जब वे संस्कृत-भाषा से पोषित की जायें। इसलिये प्रत्येक हिंदू युवक के प्राचीन भाषा के पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा आवश्यक रूप से रहनी चाहिये। संस्कृत हमारी देवभाषा है और हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा।
हिंदी को राष्ट्रीय भाषा स्वीकार करने में अन्य प्रांतों की भाषा के सम्बन्ध में कोई अपमान की भावना या ईर्षालू भावना नहीं है। हमें अपनी प्रांतीय भाषाओं से भी उतना ही अधिक प्रेम है जितना कि हिंदी से। ये सब भाषाएं अपने अपने क्षेत्र में उन्नत होती रहेंगी। वास्तव में कुछ प्रांतीय भाषाएं हिंदी भाषा की अपेक्षा साहित्य में अधिक उन्नत और अधिक सम्पन्न हैं परंतु फिर भी हिंदी अखिल हिंदुत्व की राष्ट्रभाषा होने के लिये सब प्रकार से सर्वश्रेष्ठ है। यह बात भी ध्यान में रखने की है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा-व्यवस्था के लिये नहीं बनाया गया है। वास्तविक बात यह है कि मुसलमान और अंग्रेजों के आने के बहुत पहले से ही हिंदी ने समस्त हिंदुस्थान में राष्ट्रीय भाषा का स्थान ग्रहण कर लिया था। हिंदू तीर्थ यात्री, व्यापारी और यात्रा करनेवाले देश के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमते थे- बंगाल से सिंधु तक और काश्मीर से लेकर रामेश्वर तक वे जाया करते थे और वे अपना मनोगत भाव प्रत्येक स्थान में हिंदी में ही व्यक्त कर अपना काम चलाते थे। जिस भांति संसार के बुद्धिमान हिंदुओं की भाषा संस्कृत थी, उसी भांति कम से कम एक हजार वर्षों से साधारण हिंदुओं की राष्ट्रीय भाषा हिंदी रही है। इसके अतिरिक्त आज भी हम यह देखते हैं कि भारत में जितने लोग हिंदी समझ सकते हैं या जितने लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं, उतनी अन्य किसी भाषा को न तो समझते हैं और न बोलते हैं। इसलिये प्रत्येक हिंदू विद्यार्थी के लिए यह आवश्यक कर दिया जाये कि सेकेण्डरी स्कूलों में प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी प्रांतीय भाषा की शिक्षा के साथ साथ हिंदी भी आवश्यक रूप से पढ़ाई जाये।
हिंदी से हमारा अभिप्राय शुद्ध ‘संस्कृतनिष्ठ’ हिंदी से है; उदाहरण के लिये महर्षि दयानंद सरस्वती ने जैसी हिंदी अपने सत्यार्थप्रकाश में लिखी है। सत्यार्थ-प्रकाश की हिंदी कितने सरल है, उस में अनावश्यक रूप से एक भी विदेशी भाषा का शब्द नहीं डाला गया और साथ ही उस में अपनी भावना को कितने सुन्दर रूप से स्पष्ट किया गया है। यहां यह बता देना ठीक होगा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ऐसे पहले हिंदू नेता हुए हैं जिन्होंने पहले-पहल यह बात कही थी कि अखिल हिंदुत्व की राष्ट्र-भाषा हिंदी होनी चाहिये।
हमारी इस ‘संस्कृतनिष्ठ’ हिंदी का सम्बन्ध उस हिंदूस्थानी से कुछ भी नहीं है जो वर्धा की योजना के अनुसार ज़बरदस्ती दूसरी भाषा के शब्द ठूंस कर बनायी गयी है। यह नीति भाषा को दलदल में फँसाने से कुछ भी कम नहीं और हमें इस आंदोलन को दृढ़तापूर्वक दबा देनी चाहिये। इतना ही नहीं, हमारा यह भी अनिवार्य कर्तव्य है कि हम अपनी प्रांतीय भाषाओं में से और बोलचाल की भाषा में से भी वे सब विदेशी शब्द बीन डालें जो उनमें अंग्रेजी अथवा अरबी के हैं। हम अंग्रेजी भाषा के विरोधी नहीं हैं, इस के विपरीत हमारा आग्रह है कि अंग्रेजी भाषा नितांत आवश्यक है और विश्व-साहित्य में प्रवेश करने के लिए यह एक पासपोर्ट या साधन है। परंतु हम अपनी देशी भाषाओं में विदेशी भाषाओं के बढ़न्त हुए प्रवाह को बिना आवश्यकता और बिना रोकटोक के नहीं होने देंगे। इस के लिए हमें अपने बंगाली बन्धुओं को विशेष रूप से बधाई देना चाहिये कि उन्होंने अपनी भाषा को अनावश्यक विदेशी शब्दों से बिलकुल स्वच्छ रखा है। हमारी अन्य प्रान्त की भाषाओं के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती।

हिंदूडम की राष्ट्रीय लिपि नागरी होगी:- हमारी संस्कृत की वर्ण माला ध्वनि की दृष्टि से संसार की समस्त वर्णमालाओं में सबसे अधिक परिपूर्ण है और हमारी भारतीय लिपिओं ने इस का अनुकरण पहले ही से कर लिया है। नागरी लिपि भी उसी क्रम में है। हिंदी की भांति नागरी लिपि भी समस्त भारत में गत दो हजार वर्षों से साहित्यिक लोगों में प्रचलित है। इसे “शास्त्री लिपि” के नाम से भी पुकारते हैं क्योंकि इस में हमारे धर्म-शास्त्र लिखे गये हैं। थोड़ा सा इधर उधर फेर फार करने से यह लिपि छपाई इत्यादि के लिए रोमन लिपि के समान सरल हो सकती है। इस प्रकार का लिपि-सुधार का आंदोलन महाराष्ट्र में गत ४० वर्षों से प्रचलित है। इसे श्री वैद्य तथा अन्य लोगों ने प्रचलित किया था। बाद में मेरी अध्यक्षता में यह संघटित रूप से चला और क्रियात्मक रूप से इस में हमें बड़ी सफलता प्राप्त हुई। नागरी लिपि को राष्ट्रीय लिपि बनाने के लिये मैं समस्त प्रान्तों के हिन्दू पत्रों से ज़ोरदार सिफ़ारिश करता हूँ कि वे अपने पत्रों में कम से कम एक या दो कालम अपनी प्रान्तीय भाषा के नागरी लिपि में प्रकाशित किया करें। यह बात सब लोग जानते हैं कि यदि गुजराती, बंगला भाषा भी नागरी लिपि में प्रकाशित हो तो उसे अन्य प्रान्त के लोग भी समझ सकते हैं। समस्त हिन्दुस्थान में एक भाषा तुरंत कर देना अक्रियात्मक और मूर्खतापूर्ण है। परन्तु समस्त हिन्दूडम में नागरी लिपि कर देना बहुत सरल और संभव है। फिर भी यह बात तो ध्यान में रखनी ही होगी, कि विभिन्न प्रान्तों में हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थ विभिन्न हिन्दू लिपियों में लिखे गये हैं और प्रचलित हैं, इसलिये इन लिपियों का अपना भविष्य है और नागरी लिपि के साथ साथ इन की उन्नति भी होनी चाहिये। इस समय तुरंत आवश्यकता इस बात की है कि समस्त हिन्दू विद्यार्थियों को हिन्दी भाषा के साथ नागरी लिपि की अनिवार्य्य रूप से शिक्षा दी जाया करे।
यहां आप को यह बताना भी बड़ा रोचक होगा कि कांग्रेस के पूर्व दो प्रेसिडेंटों ने राष्ट्र भाषा और राष्ट्र लिपि की समस्या को किस प्रकार हल करने का यत्न किया था। मौलाना अबुलकलाम आज़ाद कहते हैं कि राष्ट्रीय भाषा हिन्दुस्थानी ऐसी हो जो उर्दू के समान हो; परन्तु पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे भी आगे बढ़ कर कहते हैं कि राष्ट्र भाषा अलीगढ़ स्कूल की या उस्मानिया युनिवर्सिटी की हो- वही २८ करोड़ हिन्दुओं के लिये भी सब से अधिक उपयुक्त होगी। देश गौरव श्री सुभाष बाबू अपने पूर्वाधिकारी पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी बुद्धि मत्ता में बाजी ले गये हैं। वे कांग्रेस के सभापति पद से कहते हैं कि भारत के लिये सब से उपयुक्त राष्ट्र-लिपि रोमन लिपि होगी। इस प्रकार से कांग्रेस की विचार धारा राष्ट्रीय बातों का विचार करती है। यह कितनी क्रियात्मक हो सकती है, इसके सम्बन्ध में जितना थोड़ा कहा जाये उतना ही अच्छा है। आपके वसुमती, आनंद बाज़ार पत्रिका और समस्त बंगाली पत्र अब प्रतिदिन रोमन लिपि में प्रकाशित होंगे। इस नई लिपि में ‘वंदेमातरम्’ इस प्रकार लिखा जायेगा:-
“ट्रोमारॉ प्रटिमा घडिबे मण्डिरे मण्डिरे”। और फिर गीता किस बढ़िया रूप में लिखी जायेगी-
“ढर्म क्षेट्रे कुरु क्षेट्रे, शमवेटा युयुट्वा”। बस इसी प्रकार समझ लीजिये। यह ठीक है कि मुस्तफा कमाल पाशा ने अरबिक लिपि को छापने के अयोग्य समझ कर उसके स्थान में रोमन-लिपि स्वीकार की है। परंतु इस बात से हमारे उन भारतीय मुसलमानों को पाठ सीखना चाहिये जो भारत में उर्दू लिपि को [जो अरबी लिपि के ही समान है] हम हिन्दुओं पर यह कह कर जबरदस्ती ठोंकना चाहते हैं, कि यह लिपि आधुनिक रूप की है और इस का हिन्दुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है? कमाल पाशा को इसलिये रोमन लिपि का आश्रय लेना पड़ा क्योंकि उन की अपनी लिपि इस से अच्छी नहीं थी। अण्डमान द्वीप में वहां के निवासी कौड़ियों का हार बना कर पहनते हैं- इसलिए क्या धन-कुबेरों को भी कौड़ियों का हार पहनना चाहिये। हम हिन्दुओं को तो यूरोप और अरबिया के लोगों को भी नागरी लिपि हिन्दी भाषा स्वीकार करने के लिये कहना चाहिये। हमारा यह प्रस्ताव वे हठी और आशावादी लोग तो असंभवनीय नहीं समझ सकते जो उर्दू को राष्ट्र भाषा बनाने की कल्पना कर यह संभवनीय समझते हैं कि मरहठे उर्दू पढ़ेंगे और आर्य समाज के गुरुकुलों में वेदों को रोमन लिपि में पढ़ाया जायेगा!

[सन्दर्भ- हमारी समस्याएं; लेखक- वीर सावरकर; प्रकाशक- राजपाल एण्ड सन्स, नई सड़क, दिल्ली; आवृत्ति- प्रथम; पृष्ठ- ३०-३४]

प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ