कविता

कहां वो स्वर्ग

कहां वो स्वर्ग सी सुंदर धरती
कहां हो पुष्पों से भरी वाटिका,
हिमालय की कोख में बसी
श्यामल गात्र सुंदर वीथिका।

झेलम की नीर पग पखारती
कल कल ध्वनि करती हुई,
सिंचित करती वादियों को
बहती इतराती इठलाती हुई।

शीतल समीर निकल जाता
पुष्पों से भीनी सुगंध लेकर,
चहुं दिशा बिखर जाता इत्र
अप्सरा धरती पर आई उतर।

हिमालय के तुंग शिखर पर
धवल हिम रहता आच्छादित,
आकर्षण का यह केंद्र बिंदु
पर्यटकों का मन करता मोहित।

झीलों पर तैरते हुए शिकारे
अद्वितीय दृश्य का अद्भुत नमूना,
स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं
बैठकर उसमें झील में तैरना।

अतिथियों के स्वागत सत्कार में
झलकता वह नेह और भोलापन,
झेलम के स्वच्छ निर्मल जल जैसा
कश्मीरियों का सुंदर सच्चा मन।

किसने विष भर दिया मन में
रही ना हृदय की कोमलता,
वादियों के संग संग लुप्त हुई
भरी जनमानस में देशद्रोहिता।

स्वच्छ समीर दूषित हुआ
बारूदों की उड़ती धूल से,
गोलियों की ध्वनि गूंज रही
मानव की अपनी भूल से।

घाटी की भूमि क्षुब्ध हुई
घृणा ने ली स्नेह का स्थान,
सरल हृदया निवासियों का
कष्टप्रद हो उठा जीना जीवन।

युवा पीढ़ी भटक रही है
उद्देश्यहीन जाने किस ओर,
गंतव्य स्थल का कुछ पता नहीं
यह पथ ले जाएगा किस छोर।

जवानी सिसक रही है बैठ
एक कोने में तमस ओढ़कर,
रिस रहा है हृदय का घाव
असमय अपनों को खोकर।

शैशव अश्रु बहाए अकेला
अपने माता पिता को खोकर,
आततायी को क्या मिलता भला
मां से उसकी संतानें छीनकर।

यह कैसा पागलपन है छाया
क्रूरता की है कैसी पराकाष्ठा,
निष्ठा का उदाहरण देने वाले
कैसे भूल गए हैं अपनी निष्ठा।

नरक सी बन गई है आज
स्वर्ग सी अप्रतिम सुंदर धरा,
जीवन पर रह गया है केवल
देशद्रोहियों का डर और पहरा।

पुष्पों से भरी वादियों में क्यों
अपने ही लोग बने पत्थरबाज,
पुष्पों की सुगंध की जगह
बारूदों की दुर्गंध आती आज।

अपनों ने ही अपनों पर यह
किया कैसे भीषण प्रहार,
भूल कर देश प्रेम की भावना
नित्य कर रहे हैं जनसंहार।

भूलेगा कैसे देश यह क्षति
जिसने वीर सपूतों को खोया,
उत्तर उसे अवश्य मिलेगा
घिनौना खेल जिसने रचाया।

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com

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