वजह

धोखेबाज़

“नवीन अब हमें बड़ा घर ख़रीदना चाहिये क्योंकि इसमें तो चलना भी दूभर हो रहा है।” नीरू चाय का कप देते हुए कहती है।
“क्यों? क्या हुआ? अभी तो सब ठीक चल रहा था फिर अचानक ऐसा क्यों कह रही हो? मेरे पास तो सिर्फ़ एक सरकारी नौकरी है जिसमें काम चलाना पड़ता है। नहीं हम नहीं ले सकते।” नवीन बोले।
“बैंक से लोन ले लेते हैं क्योंकि अब बेटा और बेटी को अलग-अलग कमरा जो देना है। मम्मी-पापा के कमरे में अब वो रहना नहीं चाहते हैं और वैसे भी पापा बिस्तरे पर ही आ गये हैं उन्हें भी तो अलग कमरे की ज़रूरत है।” नीरू ने सलाह दी
“ठीक है चलो कल कुछ प्रापर्टी डीलरों को बोलता हूँ।” कहकर वहाँ से चला जाता है।
नीरू को तो नये घर का सपना भी आने लगा था। हाल ही में अपने बज़ट से बढ़कर उन्होंने एक मकान पर आख़िर अपनी मोहर लगा ही दी। दिल्ली जैसे बड़े शहर में मकान ख़रीदना कोई बच्चों का खेल नहीं है यह हम सब जानते हैं। सब काम सही तरीक़े से हो गया। काग़ज़ों का काम भी पूरा हो गया।
एक दिन अचानक मकान विक्रेता का फोन आता है “हम आपके साथ आगे डील नहीं कर सकते।”
नवीन बड़े आश्चर्य से “क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आखिर क्या वजह रही होगी?”
आपका एक लाख का चैक बाउंस हो गया है! आप धोखेबाज़ हैं।” मकान विक्रेता
“मैने तो बीस लाख और दिया है! हम नहीं आप धोखेबाज़ हैं! हमें भी आपके साथ सौदा नहीं करना।” नवीन ग़ुस्से में सब काग़ज़ फाड़ देता है।
“चलो अच्छा हुआ पहले ही पता चल गया कि कितने लालची थे बाद में पता नहीं कितना धोखा मिलता।” दोनों फिर नये सिरे से मकान ढूँढने में लग जाते हैं।

मौलिक रचना
नूतन गर्ग(दिल्ली)

परिचय - नूतन गर्ग

दिल्ली निवासी एक मध्यम वर्गीय परिवार से। शिक्षा एम ०ए ,बी०एड०: प्रथम श्रेणी में, लेखन का शौक