जुनून

अभी-अभी कला-दीर्घा में परिणाम की घोषणा करने के बाद शिल्पा घर वापिस आई है. रह-रहकर उसे एक चित्र के सामने लगी भीड़ की याद आ रही थी.
”चित्रकार ने गज़ब का चित्र बनाया है.” एक दर्शक का कहना था. चुपचाप भीड़ का हिस्सा बनी शिल्पा सुन रही थी.
”ये सहारा देने वाला हाथ भी बहुत खूब भूमिका अदा कर रहा है.”
”यह मर्दाना हाथ लग रहा है.”
”पति को पर्वत की ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए यह पत्नि का हाथ सहारा दे रहा है.”
”छोड़ो जी, यह हाथ ही नहीं है, एक उंगली मात्र है.”
”एक उंगली को कम मत समझो, वासुदेव नंदन श्री कृष्ण ने एक उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत ही उठा लिया था.”
”असल में यह एक उंगली नहीं, सहयोग का मधुर-शक्तिदायक अहसास है.” एक समझदार दर्शक ने कहा. शिल्पा को यह बात बहुत पसंद आई.
”यह साक्षात जुनून का अहसास है.” शिल्पा के मन ने कहा था.
यही बात उसने बाकी निर्णायकों के निर्णय के बाद उसने अपने निर्णायक मत के रूप में कही थी. यह जुनून का अहसास ही तो था, जिसने शिल्पा को पल-पल सहयोग दिया था. अन्यथा सात समुंदर पार ऑस्ट्रेलिया में पहाड़-सी जिंदगी अकेले दम जीना, दो-दो बच्चों की परवरिश कर उन्हें लायक बनाना, भारत में रहने वाले भारतीय सेना में तैनात पति का उत्साह बढ़ाना अपने आप में एक पहाड़ पर चढ़ने जैसा ही तो था!
”आप सेना में भारत रहें और मैं बच्चों के साथ ऑस्ट्रेलिया में, यह कैसे हो सकता है?” 20 साल पहले शिल्पा ने कहा था.
”शिल्पा, यही तो हमारी परीक्षा की घड़ी है न! सौभाग्य से हमें ऑस्ट्रेलिया की सिटिजनशिप मिल गई है. कल को बड़े होकर इन बच्चों को पता चलेगा, कि माता-पिता के साथ रहने के फैसले के कारण हमने ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करने का अवसर गंवा दिया था, तो वे हमें माफ नहीं कर पाएंगे. कभी मैं आता रहूंगा, कभी तुम आती रहना, समय कटता चला जाएगा.” बस विवेक के इसी परामर्श को उसने अपना जुनून बना लिया था और समय केवल कटा ही नहीं था, बहुत अच्छी तरह जिया गया था. चित्र में भारी बोझ के साथ पहाड़ पर चढ़ने को आतुर एक व्यक्ति को सहारा देती हुई वह उंगली उसे विवेक के उस परामर्श की याद दिला गई थी, जिसे शिल्पा ने अपना जुनून बना लिया था.
बच्चों ने भी अपने माता-पिता के त्याग और तपस्या को अपना जुनून बना लिया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।