बाल कविता — छुट्टी

लो गर्मी की छुट्टी लगी।
नाना जी की चिठ्ठि मिली।
जल्दी से चलदो भाई।
मेरा दिल बहलाना भाई।
मम्मी ने अटैची जमाई।
दादु ने तैयारी करवाई।
रेल ने हमें सैर कराई।
स्टेशन पर मौसी भाई।
नाना जी के घर हम पहुंचे।
जाकर उनके गले लिपट गए।
सबको हमने प्रणाम किया।
झोली भरकर आशीर्वाद लिया।
नानि जी ने माल खिलाए ।
मामी ने नखरे उठाए ।
मामा ने सैर करवाई।
चाट मिठाई हमें दिलवाई।
नाना जी ने कहानी सुनाई।
हमारे भले की सीख बताई।
अपना रिजल्ट उन्हें बताया।
अच्छा सा एक इनाम पाया।
मौसी से गप्प लगाई।
अपनी भी कुछ उन्हें सुनाई।
जी भर कर हम मस्त रहे।
खेले खाए व सोए रहे।
नानि ने भी डाट लगाई।
थोड़ा तुम कम बोलो भाई।
घर भर को हमने सिर उठाया।
नाना जी का दिल बहलाया।
पापा का फिर मैसेज मिला।
स्कूल खुलने का सन्देश मिला।
नाना जी से इजाजत ली।
घर लौटने की तैयारी की।
सबके सब हो गए उदास ।
भरी पलकों को पोछते अपने आप।
स्टेशन पर छोड़ने पहुंचे।
हम विदा हुए रोते रोते ।
अब हम पहुंचे पापा के पास।
दादा भी थे यहां उदास ।
हमने अपना बेग जमाया।
स्कूल का रास्ता अपनाया।
छुट्टी अब हो गई समाप्त।
नई पुस्तकें हो गई प्राप्त।
— दिलीप भाटिया

परिचय - दिलीप भाटिया

जन्म 26 दिसम्बर 1947 इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और डिग्री, 38 वर्ष परमाणु ऊर्जा विभाग में सेवा, अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक अधिकारी