व्यंग्य – शुरुवात मुझसे

मैंने हाईस्कूल में पढ़ा था कि भारत मानसूनी जलवायु का देश है। गलत है। मैं सुधारता हूँ- भारत चुनावी जलवायु का देश है। मानसून कभी-कभी रूठ जाता है। भटक जाता है। चुनाव कभी नहीं रूठते। हर बार समय पर आते हैं। ज़्यादा खुश हुए तो समय से पहले भी आ जाते हैं। मानसून आता है तो किसान खुश होते हैं। चुनाव आने पर नेता।
चुनाव का मौसम बनते ही सबसे पहला प्रभाव नेताओं पर होता है। रात को चुनाव-घोषणा का समाचार सुनकर सोते हैं। सपना दिखता है कि उन्हें किसी मसले पर अपनी पार्टी से असंतुष्ट होना है। सुबह शौच के साथ उनका हृदय परिवर्तन होता है और दोपहर के भोजन के बाद वह असंतुष्ट आत्मा दूसरी पार्टी के चोले में प्रवेश कर जाती है।
अगला प्रभावित जीव होता है- सरकारी कर्मचारी। उसकी सारी अपेक्षा होती है सरकार से लेकिन ये जीव चुनाव से उतना ही दूर भागता है जितना नयी अभिनेत्री कपड़ों से। वास्तव में उसे शिकायत चुनाव से कम चुनाव में लगनेवाली उसकी ड्यूटी से होती है। यह प्रसंग बड़ा रोचक होता है।
नालायक और कामचोर को भाई-बहन या रिश्तेदार के ब्याह की चिंता सताने लगती है। बात-बात पर माँ-बाप का अपमान और अवज्ञा करनवाला बेटे में अचानक श्रवण कुमार की आत्मा घुस जाती है। सास-ससुर से हमेशा लड़नेवाली बहू के लिए यह समय उनकी सेवा कर मोक्ष प्राप्ति करने योग्य मुहूर्त बन जाता है। बीमार बच्चे की उपेक्षा करनेवाले द॔पतियों के भीतर वात्सल्य की गंगा-जमुना में बाढ़ आ जाती है। बात-बात में रूठकर तलाक की धमकी देनेवाले दंपतियों के लिए यह दुख रीतिकालीन नायिका के वियोग की भाँति हो जाता है।
सारे के सारे कलेक्टर कार्यालयमुखी हो जाते हैं। सबका एक ही लक्ष्य होता है-हे कलेक्टर देवा!हमरी ड्यूटी दूर करो। कलेक्टर ऑफिस के चपरासी का रुतबा भी इस मौसम में महादेव के नंदी से कम नहीं होता। सब उसकी पूजा करते हैं। सारे देश की राजनैतिक चेतना एकदम सचेत हो जाती है। भिखारी भी हिसाब करने लगता है कि किसकी सरकार बनेगी तो आयकर में लाभ मिलेगा? कुछ लोगों को याद आता है कि उन्हीं का पूर्वज आदम था इसलिए उन्हें आदिवासी घोषित कर दिया जाना चाहिए था अब तक, लेकिन बेचारे पिछड़ों का भी सम्मान नहीं मिला। कामचोरों को अपने बेरोजगार होने का कीड़ा काटने लगता है। नयी सरकार बेरोजगारी भत्ता बढ़ानेवाली हो। रिश्वतखोर ऐसी सरकार की चाहत रखते हैं जो जेब गरम करने के रास्ते खोल दे। धर्म और जातीयता की भाँग चटाकर खून की होली खेली जाती है। अत्याधुनिक जीवन शैली में जीनेवाले नेताओं की आत्माएँ भगवान के चरण और शरण गामी हो जाती हैं। शुद्रों के चरण पूजनीय हो जाते हैं। समाजवादी मेंढ़क सवर्णों के खिलाफ़ टर्राना शुरू कर देते हैं।
भारतवर्ष में चुनाव अगले पाँच वर्ष के लिए बुझा हुआ अलाउद्दीन का वह चिराग होता है जिसे रगड़कर हर नागरिक उससे निकले हुए जिन्न से अपनी मुराद पूरी करवाना चाहता है। भगवान सबकी इच्छा पूरी करें।पर…… शुरूवात, मुझसे करें।

— शरद सुनेरी