सात दाने

सहाना के पोते को स्कूल के लिए साइंस का कोई एक्सपेरिमेंट करके विश्लेषण करके ले जाना था. वह दादी से पूछकर एक छोटे डिब्बे में चावल ले गया था. बाद में जब दादी ने देखा तो वहां चावल के दाने बिखरे पड़े थे. दादी ने चावल के दाने समेटकर वापिस बड़े डिब्बे में डालने के लिए उठाए, देखा चावल के सात दाने थे. वे सात दाने सहाना को सुदूर अतीत में ले गए, जब वह बहुत छोटी बच्ची थी.
”पापा, रेडियो में बार-बार ‘फागुन आयो रे’ गाना आता रहता है, होली आने वाली है क्या?” सहाना ने पूछा था.
”हां बेटा, होली आने ही वाली है.”
”पापा फिर आप हमें सात रंग ला दीजिए न! हम भी सबको रंग लगाएंगे.” सहाना मचल गई थी.
”सात रंग क्यों?” पापा ने पूछा था.
”पापा, हमारी मैम ने बताया था, कि इंद्रधनुष में सात रंग होते हैं, मुझे इंद्रधनुष बहुत प्यारा लगता है.”
”पर मेरी बेटी तो पहले ही सतरंगी है!” पापा ने बिटिया को बहलाना चाहा था.
”वो कैसे भला!” सहाना ने बहलने का स्वांग रचा था.
”मेरी बेटी में ‘स’ से शुरु होने वाले सद्गुण जो हैं. कहो तो बता दूं?”
”बता दीजिए, पर सात रंग जरूर ला दीजिएगा.” बच्ची ऐसे ही भला कब बहलने वाली थी!
”मेरी बेटी सच्ची है, सरल है, संयमित है, सात्त्विक है, सचेत है, संतुष्ट है, संवेदनशील है, हो गए न सात सद्गुण!”
”ऊं ऊं ऊं–पापा इतने भारी-भरकम शब्द भला मैं क्या समझूं! मुझे तो लाल-नीला-पीला-हरा आदि सात रंग चाहिएं.” सहाना मचल गई थी.
तब भले ही वह सात रंगों से सबको रंगकर खुश हो गई थी, लेकिन जिंदगी में सफलता तो उसे ‘स’ से सात सद्गुणों ने ही दिलाई थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।