गज़ल

हरदम करता रहा सफर मैं
बना न पाया कहीं भी घर मैं
==================

लोगों ने आवाज़ बहुत दी
लेकिन ठहरा नहीं किधर मैं
==================

छोड़ गया जब तू ही मुझको
क्या करता तनहा जीकर मैं
==================

किससे-किससे बचूँगा कबतक
सबके निशाने के ऊपर मैं
==================

तू मंदिर की मूरत जैसी
सूनी राहों का पत्थर मैं
==================

ख्वाब है तू या कोई हकीकत
आ देखूँ तुझको छूकर मैं
==================

आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।