डांसिंग फ्लोर की अभिलाषा

डांसिंग फ्लोर की अभिलाषा

‘कितनी बेरहमी से कुचला है, जगह जगह चोट लगी है, कई जगह से फट गया है’ पट्टी लगाते लगाते मोहन कह रहा था। ‘तुम्हें तनिक भी दर्द नहीं होता, इतनी पीड़ा, पर कैसे झेल लेते हो इतना सब कुछ’ मोहन ने डांसिंग फ्लोर पर पट्टी लगाते हुए पूछा। डांसिंग फ्लोर मोहन के सांत्वना भरे शब्द सुनकर मुस्कुराया। ‘जब मेरे सीने पर सैंकड़ों कदम खुशी में थिरकते हैं तो उनके चेहरों पर छलकती मुस्कान के आगे मैं अपनी पीड़ा भूल जाता हूँ। संगीत पर थिरकते कदमों से जैसे मुझमें भी जान आ जाती है अन्यथा तो मैं निष्प्राण पड़ा रहता हूँ’ डांसिंग फ्लोर ने अपने उद्गार प्रकट किये थे। ‘पर इतनी गहरी चोट तुम्हें कब लगी?’ मोहन ने डांसिंग फ्लोर से फिर पूछा। ‘दोस्त, तुम पहले आदमी हो जो मुझसे मेरी व्यथा पूछ रहे हो। दरअसल यह चोट मुझे एक दिन में नहीं लगी। कई दिनों तक जब मेरा इस्तेमाल होता है और मेरे घाव गहरे होते जाते हैं और कदम ही मेरे सीने पर थिरकने से जब सकपकाते हैं तो मजबूरन मेरे स्वामी को तुम्हारे पास लाकर मरहम-पट्टी करवानी पड़ती है।’ डांसिंग फ्लोर ने बताया।

‘भाग्य की विडम्बना यह है कि मेरे घायल होने पर रक्त नहीं निकलता। अगर रक्त निकलता होता तो रक्त निकलते ही थिरकते कदम घबरा कर मेरे सीने से हट जाते और फिर मेरे स्वामी को तुम्हारे पास जल्दी जल्दी लाना पड़ता।’ डांसिंग फ्लोर को अब मोहन से मित्रता सी हो गई थी। ‘तुमने कहा जब तक तुम पर कदम नहीं थिरकते तब तक तुम निष्प्राण रहते हो, तब तो तुम्हारे मन में टीस उठती होगी’ मोहन ने कुरेदा था। ‘हाँ भई मोहन, मुझसे ज्यादा तो मेरा स्वामी परेशान होता है, उसके मन में ज्यादा टीस उठती है’ डांसिंग फ्लोर ने कहा। ‘वो क्यों?’ मोहन का अगला सवाल था। ‘सीधी-सी बात है, जब तक मुझ पर कदम नहीं थिरकेंगे, स्वामी पर पैसों की वर्षा कैसे होगी, अरे भई मैं उसकी रोजी-रोटी हूँ’ डांसिंग फ्लोर ने बताया। ‘हाँ, यह तो ठीक कहा तुमने’ मोहन को संतुष्टि हुई थी।

’पर यह बताओ कभी ऐसा मौका आया जब तुम्हें बेइंतहा खुशी हुई हो’ मोहन को डांसिंग फ्लोर से बात करने में आनन्द आ रहा था। ‘हाँ, ऐसे मौके आये और ईश्वर करे ऐसे मौके आते रहें। जब जब मुझ पर नन्हे मुन्हे थिरकते हैं तो मेरे मन को बहुत शान्ति मिलती है। उनके नन्हे कदमों से मैं प्रफुल्लित हो उठता हूँ। उनकी मुस्कुराहट देखकर मैं भी खुश हो जाता हूँ। दूसरा जब मुझ पर सैनिकों के कदम थिरकते हैं तो मेरा सीना गर्व से चैड़ा हो उठता है। मैं चाहता हूँ कि उनके कदम थिरकते ही रहें, थिरकते ही रहें, कभी न थकें।’ डांसिंग फ्लोर आनन्दमग्न हो रहा था। ‘चलो, बच्चों की बात तो समझ आई कि उनके नन्हें कदम तुम्हें चोटिल नहीं करते। पर सैनिकों के तो भारी-भरकम बूट होते हैं, वे तो तुम्हारा सीना छलनी कर देते होंगे। तुम चीत्कार कर उठते होगे’ मोहन का अगला सवाल था। ‘क्या कहते हो मोहन भाई, कभी सैनिकों के पथ में बिछ कर तो देखो। अगर तुम्हें याद हो पं. माखनलाल चतुर्वेदी जी की सुप्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ तो तुम सब कुछ समझ जाओ। उसमें कोमल पुष्प कहते हैं ‘मुझे तोड़ लेना वन माली, उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाते वीर अनेक’। जब कोमल पुष्प सैनिकों के भारी-भरकम बूटों के तले रौंदे जाने को सदैव तत्पर रहते हैं तो मुझ जैसा कुछ कठोर उनके कदमों की थिरकन को महसूस करके, उनके आनन्द की अनुभूति कर गर्वित ही तो अनुभव करेगा’ कहते-कहते डांसिंग फ्लोर का सीना चैड़ा हो उठा था और उसने बोलना जारी रखा ‘तुमने कहा कि घायल होने पर क्या मैंने कभी चीत्कार नहीं किया, तो तुम्हें इस बात को नहीं भूलना चाहिए जब रणभूमि में गोलियों के कदम सैनिकों के सीनों को छलनी कर देते हैं तो क्या वे कभी चीत्कार करते हैं ? कभी नहीं, वे तो और गोलियाँ खाने के लिए तत्पर रहते हैं। वे अपनी जिन्दगियाँ देकर हमें जिन्दगियाँ दे जाते हैं। न जाने किस मिट्टी के बने होते हैं ये सैनिक और उन्हें जन्म देने वाले माँ-बाप? ये सैनिक ही हैं जो धरती माँ पर न्यौछावर होकर वास्तव में अपनी माँ के दूध का कर्ज उतार पाते हैं। मैं उन्हें हृदय से नमन करता हूँ और ऐसे वीर पुरुषों के कदमों की थिरकन हमेशा ही महसूस करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे सभी भाई-बन्धु डांसिंग फ्लोर सैनिकों की राह में बिछ जायें जब वे गाते हुए जा रहे हों ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिन्दगी है कौम की, तू कौम पर लुटाए जा’। यह मुझ जैसे डांसिंग फ्लोर के जीवन की अभिलाषा है।

परिचय - सुदर्शन खन्ना

वर्ष 1956 के जून माह में इन्दौर; मध्य प्रदेश में मेरा जन्म हुआ । पाकिस्तान से विस्थापित मेरे स्वर्गवासी पिता श्री कृष्ण कुमार जी खन्ना सरकारी सेवा में कार्यरत थे । मेरी माँ श्रीमती राज रानी खन्ना आज लगभग 82 वर्ष की हैं । मेरे जन्म के बाद पिताजी ने सेवा निवृत्ति लेकर अपने अनुभव पर आधरित निर्णय लेकर ‘मुद्र कला मन्दिर’ संस्थान की स्थापना की जहाँ विद्यार्थियों को हिन्दी-अंग्रेज़ी में टंकण व शाॅर्टहॅण्ड की कला सिखाई जाने लगी । 1962 में दिल्ली स्थानांतरित होने पर मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक की उपाधि प्राप्त की तथा पिताजी के साथ कार्य में जुड़ गया । कार्य की प्रकृति के कारण अनगिनत विद्वतजनों के सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने को मिला । पिताजी ने कार्य में पारंगत होने के लिए कड़ाई से सिखाया जिसके लिए मैं आज भी नत-मस्तक हूँ । विद्वानों की पिताजी के साथ चर्चा होने से वैसी ही विचारधारा बनी । नवभारत टाइम्स में अनेक प्रबुद्धजनों के ब्लाॅग्स पढ़ता हूँ जिनसे प्रेरित होकर मैंने भी ‘सुदर्शन नवयुग’ नामक ब्लाॅग आरंभ कर कुछ लिखने का विचार बनाया है । आशा करता हूँ मेरे सीमित शैक्षिक ज्ञान से अभिप्रेरित रचनाएँ 'जय विजय 'के सम्माननीय लेखकों व पाठकों को पसन्द आयेंगी । Mobile No.9811332632 (Delhi) Email: mudrakala@gmail.com