राधा मैं हारी

सुन लो पुकार मेरी, कहती है राधा बेचारी।
अब न बनूंगी मैं राधा, बनके राधा मैं हारी।।

सुनो हे गिरधारी मुरली मनोहर
अगले जन्म तुम्हें है राधा बनना,
बनूंगी मैं कृष्ण कन्हैया तुम्हारा
सही जो पीर मैंने तुम्हें है सहना।

विरह वेदना में जली, बनके संगिनी तुम्हारी।
अब न बनूंगी मैं राधा, बनके राधा मैं हारी।।

मुरली मनोहर तुम ने बजाई
बंसी की धुन सुनकर मैं आई,
जग में कलंकिनी में कहलाई
हिय पे चोट मैंने सौ बार खाई।

दुनिया तुम्हें पुकारे, तुम पर जाए बलिहारी।
अब न बनूंगी मैं राधा, बनके राधा मैं हारी।।

तुम ने बिखेरी मधुर मुस्कान
उंगली पर उठाया तुमने गोवर्धन,
जाने क्या क्या रंग दिखा कर
जीत लिया तुमने सबका चितवन।

सास ननदिया मारे ताने, बरसे अखियां मेरी,
अब न बनूंगी मैं राधा, राधा बनके मैं हारी।।

प्रीत ना करती कभी तुमसे
जानती प्रीत किए दुख होय,
संसार पथ में है कांटे बोए
बेबस दो अखियां मेरी रोए।

गोपियों संग रास रचाई,कैसी लीला तुम्हारी।
अब न बनूंगी मैं राधा, राधा बनके मैं हारी।।

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

 

 

 

 

 

देखो एक बार राधा बनकर
बिरह की व्यथा समझ कर,
किस विध मैं तड़पी रात दिन
काटी रातियाँ तारे गिन गिन।

रुक्मणी संग ब्याह किया,समझी न प्रीति मेरी।
अब न बनूंगी मैं राधा, राधा बनके मैं हारी।।

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com