कहानी

कहानी – किस्मत का सितारा

सुधा तैयार होकर बेटे को लेकर घर से निकल कर जैसे ही थोड़ा आगे गयी तो, चबूतरे पर बैठी हुईं महिलाओं में से बातें करती हुई मेधा चाची की बातें उसके कानों में पड़ीं। मेधा चाची कह रही थीं कि लो, इसे देखो, पति की मृत्यु हो गयी है, उसका कुछ अता न पता, और यह सज-धज, सिंगार कर, माँग भर कर चली जा रही है।’

बातें करतीं हुईं चाची की ये बातें उसे अच्छी नहीं लगीं। वह वहीं रुक गयी, उससे रहा नहीं गया और वह मुड़ कर चबूतरे तक गयी और बोली –  “माफ़ करिए चाची जी, यह बात ठीक नहीं, आप जब तब मेरे पति की बात करती हैं। सुनिए ध्यान से, मेरे पति की मृत्यु नहीं हुई है। मृत्यु की ख़बर ज़रूर  मिली है, लेकिन वह कहीं न कहीं ज़रूर सही-सलामत हैं, मेरा मन यही कहता है, इसलिए मैं साज-सिंगार करती हूँ, माँग भरती हूँ। मुझे भगवान पर विश्वास है, वह उनकी दया से सुरक्षित हैं। मेरे पति ज़िंदा हैं, ज़िंदा। मेरी किस्मत का सितारा बहुत बुलंद है। आइन्दा प्लीज़ ! ऐसी बातें मत किया करें। धन्यवाद।”

इतना कह कर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये वह आगे बढ़ गयी। सुधा सोचने लगी कि न जाने ये महिलाएँ उसके बारे में कितनी व कैसी-कैसी बातें करती होंगी। पर उसे ऐसी बातों की परवाह नहीं थी। उसका मन कहता था कि उसके पति निहाल जहाँ कहीं भी होंगे, सुरक्षित होंगे, वह आएँगे ज़रूर। उसे पति की याद आने लगी। वह सोचने लगी कि कौन-सा ऐसा पल है, जब पति की याद नहीं आती। वह कैसे रह रही है, उनके बिना, बस वही जानती है।

‘ सुधा ! सुधा ! ‘  घर में आते ही निहाल उसे पुकारने लगा था। सुधा के सामने आते ही कंधों से उसे पकड़ कर कहा कि उसकी पोस्टिंग बमवर्षक लड़ाकू विमान पर हो गयी है। उसे सीमा पर जाना होगा। सीमा पार दुश्मन की सभी  चौकियों को नष्ट करना होगा। दुश्मनों के बढ़े हौसलों को पस्त करना होगा। चिंता करने की कोई बात नहीं, सुधा। मुझे देश सेवा का असली मौका तो अब मिला है।मेरी मनोकामना अब पूरी होने जा रही है, सुधा। सच, मैं बहुत ही खुश हूँ। भगवान की लाख-लाख मेहरबानी, जो मुझे यह सुनहरा अवसर मिल गया। उनकी कृपा, उनका साया मेरे ऊपर है।

पर दुश्मनों की सीमा में घुस कर बम वर्षा करना, फिर वापस आना, राडार की   पकड़ में विमान का आना, ख़तरे से खाली नहीं है न, निहाल। मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं अंतर तक काँप गयी हूँ। यह सब ख़तरे से खाली नहीं है। मैं मना नहीं करती इस काम के लिए, पर ……..         “नहीं-नहीं सुधा, डरने की कोई बात नहीं है इसमें।”निहाल ने सुधा की बात बीच में ही काटते हुए कहा। हमें ट्रेनिंग तो इन्हीं सब ख़तरों से खेलने व जूझने की मिलती है। हमें सिखाया जाता है कि यदि दुश्मनों के घेरे में आ भी जाओ, तो भी किस तरह कलाबाजियाँ खाते हुये और डाइव मार कर आगे तक बढ़ते हुये दुश्मनों को चकमा देकर बच निकलना है कि उन्हें पता तक नहीं लगता। वे ढूँढ़ते रह जाते हैं। राडार की जद में तो आ ही नहीं सकते हम। दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं व वे दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। इसके अलावा भी हमें गुप्त ट्रिक्स सिखाई जाती हैं दुश्मनों से बचने की। ये सारे तो दाँव-पेंच हैं सेना के, जो हर किसी को बताए नहीं जा सकते, इन्हें तो युद्ध के मैदान में ही आज़माया जाता है। मुझे बहुत ही खुशी हुई है कि मुझे इस काम के लिए चुना गया है। चलो, अब मुझे जाने की तैयारी भी करनी है।”

निहाल बात कर ही रहा था कि उनका बेटा अंदर आया और बोला कि पापा ! पापा ! मेली भी तैयाली कल दो, मुझे भी आना है आपके साथ। निहाल ने उसे गोद में उठाया, पुचकारा और कहा कि हम सब चलेंगे बाद में एक साथ, मेरे बच्चे। अभी तो मैं ड्यूटी पर जाने की बात कर रहा था।   निहाल तैयार होकर नाश्ता-चाय लेने लगा तो, उसने देखा कि सुधा बहुत उदास दिख रही है। वह उसके पास गया और समझाने लगा कि वह शीघ्र ही वापस आ जाएगा, और सही सलामत आएगा। उदास मत होओ, सुधा। मातृभूमि मेरी माँ है। मैंने माँ की सेवा का व्रत लिया है, सुधा। इस सेवा में मेरे प्राण भी चले जाएँ, तो मैं खुशी-खुशी न्योछावर कर दूँगा।

“ऐसे शब्द मुँह से मत निकालिए, प्लीज़”, कहकर रुआँसी-सी होकर वह उसके सीने से लग गयी।      “अच्छा तो, चलो, रोना नहीं, प्लीज़। अब मुझे खुशी-खुशी विदा करो।”

सुधा बेमन से मुस्कुरायी। निहाल ने बेटे को प्यार किया और भगवान के सामने शीश नवाया तथा प्रण ले देश की रक्षा के लिए विदा हो गया।

दिन गुज़रते गये। निहाल की ओर से कोई समाचार नहीं मिला। सुधा की बेचैनी शुरू हो गयी। आफ़िस में फोन लगाया, नहीं लगा। अब वह क्या करे, क्या न करे, किसे बताए, किसके पास जाये। बार-बार फोन लगाने पर भी निराशा ही हाथ लग रही थी। किसी भी काम में उसका मन नहीं लग रहा था।

घंटी बजने पर वह फटाफट ही दरवाज़े की ओर भागी। दरवाज़ा खोलने पर सामने दो जवानों को खड़ा पाया। सलाम ठोकने के बाद उसे बताया गया कि  निहाल का कहीं भी पता नहीं चल पाया है । पंद्रह दिनों से उससे संपर्क भी टूट गया है, जिससे अगली खोज ख़बर मिलने तक उसे मृत घोषित किया जाता है। पहले आपको इसलिए सूचित नहीं किया कि शायद उनकी कोई ख़बर मिल जाये। फिर भी हम प्रतीक्षारत हैं। सुधा सकते में आ गयी। जवान वहाँ से चले गये। भगवान के समक्ष उसने घुटने टेक दिए और अपने सुहाग की कुशलता की दुआ माँगी कि वह जहाँ कहीं भी हों, सुरक्षित रहें बस।

दिन गुज़रते चले गये। निहाल का अभी तक कोई संदेश न आने पर या उसके आॅफ़िस से कोई ख़बर न आने पर  सुधा की बेचैनी बढ़ने लगती, वह रोने लगती, और फिर स्वयं को तसल्ली देकर शांत हो जाती।

समय यूँ ही बीतता गया। आज फिर जब दरवाज़े की घंटी बजी तो, उसने ऐसे दरवाज़ा खोला, जैसे वह निहाल के आने पर खोलती थी। सामने सेना की जीप व जवानों को देख परेशान-सी हो गयी। तभी बाहर दरवाज़े की एक ओर खड़ा निहाल सामने आकर बाँहें फैलाते हुये बोला कि मैं कहकर गया था न ! लो, मैं आ गया, और सुधा को बाँहों में भर लिया। सुधा बोली कि ओह ! इतनी लंबी प्रतीक्षा ? मुझे मालूम था कि मेरी किस्मत का सितारा बहुत बुलंद है। जीप वहाँ से चली गयी। उसके आने की खुशी में पास-पड़ोस के लोग भी बधाइयाँ देने आने लगे, और ‘ इतने दिनों में क्या हुआ ‘, के बारे में पूछने लगे।

निहाल ने बताना शुरू किया कि उसने दुममनों की सीमा में घुस कर उनकी आठ चौकियाँ तहस-नहस कर दी थीं। नौवीं के बाद दसवीं चौकी तक पहुँचने पर बम फेंकते ही विमान शायद गोली लगने से पीछे का भाग क्षतिग्रस्त होने से कुछ डाँवाँडोल हुआ, लेकिन सँभालते हुये मैं उसे सीमा से निकाल लाने और एक गाँव तक ले आने में सफल तो हो गया, पर लैंड करते-करते सँभल न सकने के कारण गिर गया। मैं निकल कर भागने लगा और आगे जाकर ठोकर लगने से गिरने पर मेरे सिर तथा शरीर के अन्य हिस्सों में भी में चोटें लगीं, और मैं बेहोश हो गया। गाँव वालों ने यह दृश्य देख लिया था। उन्होंने मुझ बेहोश को अस्पताल में भर्ती करवाया। मेरा इलाज चला। थोड़ा स्वस्थ होने पर मेरी खोजबीन शुरू हुई, आॅफ़िस में सूचना भेजी गयी, और अब मैं पूर्णतया स्वस्थ आप लोगों की दुआओं से आप सबके सामने हूँ।

सेना ने मुझे वायुसेना के वीरता पदक से सम्मानित करने और मेरा प्रमोशन करने की घोषणा कर दी है। मैं अपने देश का जाँबाज़ सिपाही हूँ, मुझे नाज़ है अपने देश पर, अपने महान देश पर। मैं सौ-सौ बार जन्म लेकर भी रक्षा करता हुआ देश पर न्योछावर होना चाहूँगा। सभी ने भारत माता की जय के नारे लगाये और बोले कि हमें देश के लिए ऐसे ही शूरवीरों की ज़रूरत है। धन्य हैं आप और आपका साहस। हमारा आपकी जननी को कोटिशः नमन, जिसने ऐसे वीर जाँबाज़ सपूत को जन्म दिया। आप जैसे रक्षकों के कारण ही हम सभी देशवासी सुरक्षित हैं। लाखों-लाखों सलाम आपको।

तभी उनका बेटा विक्की वहाँ आया और बोला -“पापा ! पापा ! मैं भी बला होकर दुश्मनों को मालूँगा।” नन्हें बेटे के मुंह से ये शब्द सुनकर सभी हँसने लगे।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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