लघुकथा

अभिशप्त

”मैं नादान हो गया हूं या इंसान!” बिगड़े बोलों वाले अग्निपथ पर चलने वाले इंसानों को देखकर आज के समय का खुद से सवाल था.

”इसे नादान कहना चाहिए या असभ्य?” समय का मंथन जारी था.
”बौद्धिक कहा जाने वाले मनुष्य जब जीत के लिए चुनावी सभा में जूतों और लातों की भाषा पर आ जाए तो क्या उसे मनु की संतान मनुष्य कहना तर्कसंगत होगा!” निरंतर चलते रहने वाले समय की विचारधारा भला कहां थम सकती थी!
”बिगड़े बोलों वाले ये (मुझे तो इनके लिए कोई समीचीन संबोधन ही नहीं मिल रहा!) समाज को क्या देकर जाएंगे भला!”
”यही बिगड़े बोल इनकी विरासत ही न बन जाए!”
”विरासत! विरासत तो बन चुकी है! पहले चुनावी सभा में लोग संबंधित दल के विचार झपटने के लिए आते थे, अब तो लोग चुनावी सभा में मोबाइल झपटने के लिए आते हैं.”
”ठहरो-ठहरो,” समय ने शायद खुद से ही कहा, ”इसे विरासत नहीं, सियासत कहिए.”
”ये लो, इन बिगड़े बोलों ने मुझे भी भटका दिया! ‘चरैवेति-चरैवेति” सिखाने वाला और उसका अनुसरण करने वाला मैं भी ”ठहरो-ठहरो,” कहने पर उतारू हो गया, यह मेरी असभ्यता का प्रमाण नहीं तो और क्या है!” समय का कथन जारी था, ”शायद यही बिगड़े बोल कल इन मनुष्यों का भी अभिशाप न बन जाएं!”
समय के प्रभाव से अभिशप्त समय अपनी चाल से चलता रहा.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “अभिशप्त

  1. आज का युग बिगड़े बोलों से व्यथित है. आज के समय को यह भी समझ नहीं आ रहा, कि वह स्वयं अभिशप्त हो गया है या इंसान! बहरहाल इन्हीं बिगड़े बोलों के कारण बहुत-से लोगों को चुनाव आयोग द्वारा चुनाव-प्रचार न करने की सजा दी गई है और बहुत-से लोगों का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने फैसले के लिए आया है, कि उनका चुनाव क्यों न रद्द किया जाए! सच में समझ नहीं आता कि कौन अभिशप्त है! बिगड़े बोलों वाले लोग या आम जनता या आज का समय!

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