आत्मविश्वास

आज सात्त्विका बहुत ही खुश थी. उसके चित्र को प्रथम पुरस्कार से जो नवाजा गया था. उसे भानजे ऋत्विक के साथ हुई गुफ़्तगू याद आ रही थी.
”मौसी जी, आप तो ऑस्ट्रेलिया से अभी आने वाली नहीं थीं, जल्दी कैसे आ गईं?”
”अंदाजा लगाओ, मैं जल्दी क्यों आ गई?” सात्त्विका ने कहा.
”एक कारण तो मुझे पता है. लोकतंत्र का महोत्‍सव आने वाला है और आपको वोट जरूर देना होता है, यह तो हम सब अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन उसमें तो अभी बहुत देर है. आप तो दो महीने पहले ही आ गईं!”
”सही अंदाजा लगाया तुमने ऋत्विक, मैं दो महीने पहले ही आ गईं. मैंने एक चित्रकला प्रतियोगिता का विज्ञापन देखा था. इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए एक चित्र बनाना था, इसलिए जल्दी आ गई हूं.”
”पर मौसी जी, आपने तो धुंधला दिखने के कारण चित्र बनाना ही छोड़ दिया था न!”
”बिलकुल छोड़ दिया था, दोनों आंखों में कैटरिक जो हो गया था. वो तो भला हो हमारी बहू का, जिसने दोनों आंखों का कैटरिक का ऑपरेशन ऑस्ट्रेलिया में करवा दिया.”
”मौसी जी, आप तो यहां सरकारी मुलाजिम थीं, यहां तो आपका ऑपरेशन मुफ्त में ही हो जाता, वहां तो बहू-बेटे का बहुत खर्चा हो गया होगा!” ऋत्विक ने हैरानी से कहा.
”हां, पर यहां तो मैं ऑपरेशन के बाद रसोई की आंच के सामने न जाने की आवश्यक परहेज नहीं न कर पाती, घर में अकेली जो हूं! वहां तो बच्चों ने और उनके बच्चों ने मिलकर सब संभाल लिया.”
”तभी आप इतनी खूबसूरत लग रही हैं!” ऋत्विक के लहजे से शरारत टपक रही थी.
”अरे बेटा! अब बुढ़ापे में क्या खूबसूरती बढ़ेगी!” मौसी ने उस समय कह तो दिया, पर ऋत्विक के जाने के बाद आइने में अपना अक्स देखा, सचमुच उनको अपनी खूबसूरती की अनोखी झलक दिखाई दी. इसी झलक ने उनके अंदर आत्मविश्वास भर दिया था.
इसी आत्मविश्वास से उन्होंने वह पुरस्कृत चित्र बनाना शुरु किया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।