कितना असरकारक होगा महागठबंधन ?

लोकसभा चुनावों की गतिविधियों में काफी तेजी आ गयी है और मैनपुरी संसदीय क्षेत्र से सपा -बसपा महागठबंधन की संयुक्त रैलियों का आगाज हो चुका है। 24 साल से जो लोग एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे और जनता के बीच जाकर एक दूसरे को जेल भेजने की धमकी देते रहते थे आज वही लोग एक मंच पर आकर एक दूसरे के लिए वोट मांग रहे हंै। 2019 की राजनीति का यह वास्तविक परिवर्तन तो है लेकिन यह राष्ट्रवाद और विकासवाद की लहर के आगे कितना टिक पायेगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। क्या जनमानस इन लोगों के पुराने कारनामे माफ कर देगा? क्या 24 साल बाद एक बार फिर ये लोग इतिहास रच पायेंगे? सवाल कई हैं, लेकिन अब जनमानस इनका जवाब आगामी 23 मई को लिख रहा है।
प्रदेश के जनमानस को इन सभी दलों के इतिहास और आचरण को एक बार फिर याद करना होगा। जो बसपा सुप्रीमो मायावती आज सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा करते हुए उन्हें ओबीसी का सबसे बड़ा नेता और पीएम नरेंद्र मोदी को फर्जी बता रही थीं यह वही बसपा सुप्रीमो मायावती हैं जिन्होंने प्रदेश में भाजपा के साथ मिलकर सरकारें बनायीं और गिरायीं। बसपा सुप्रीमो मायावती पर किसी को भी भरोसा नहीं करना चाहिए, लेकिन यह राजनीति है वह भी भारतीय राजनीति, जिसमें नेता व दल अपना राजनैतिक अस्तित्व बचाकर रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।
यह भारत की राजनीति का ही एक विलक्षण उदाहरण बन गया है कि लोग देशहित के नाम पर अपने घोर अपमान और अत्याचार को भी भूल गये हैं। यहां वोटों के लिए लोग अपमान का कड़वा घूंट भी पीने को तैयार हो जाते हैं। मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव और मायावती की एक मंच पर मौजूदगी अपने आप में राजनीति का एक बहुत बड़ा संदेश दे रही थी। मंच पर मायावती बीच में बैठीं और मुलायम और अखिलेश उनके अगल-बगल बैठे। सपा और बसपा का यह महागठबंधन वाकई में बेहद मजबूरी का बनाया गया गठबंधन है यह सत्य प्रतीत हो रहा है।
जब से नरेंद्र मोदी व अमित शाह की अगुवाई में नई भाजपा का उदय हुआ है तब से इन दलों का अस्तित्व व परिवारवाद की बिसात पर राजनीति करने वाले लोगों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश में भाजपा गठबंधन 73 सीटों पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त करने में सफल रहा। उसके बाद 2017 में विधानसभा चुनावों में तो सपा और बसपा का तो जमीनी धरातल ही हिल गया था। उसके बाद त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली जीत के बाद महागठबंधन की बातें राजनैतिक गलियारे में तैरने लगी थीं। लेकिन जिस महागठबंधन के स्वरूप की बात की जा रही थी कम से कम वह तो अपने धरातल पर नहीं उतर सका है। 2014 में बसपा जीरो पर निपट गयी थी और सपा से मुलायम सिंह और डिंपल यादव आदि ही अपना परम्परागत गढ़ बचाने में सफल रहे थे।
मैनपुरी की रैली में बहन मायावती जी ने पहले मुलायम सिंह यादव के लिए एक मंच से वोट मांगा और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फर्जी आरोपों की झड़ी लगाकर अपनी विकृत मानसिकता का परिचय दिया है। मायावती जी ने अपने भाषण में मुलायम सिंह को भारी मतों से जिताने की अपील की और मुलायम सिंह यादव ने इसके लिए उनको धन्यवाद भी दिया। दोनों नेताओं ने मंच पर एक दूसरे की खूब प्रशंसा की।
अब सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश में सपा और बसपा मिलकर चुनाव लड़ तो रहे हैं लेकिन क्या इन दोनों ही दलों के कार्यकर्ता और इनका वोटबैंक एक दूसरे का समर्थन कर रहा है? इस सवाल पर अब भी लगातार बहस जारी है। गठबंधन के कारण अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में अलग-अलग जमीनी स्थितियां हो सकती हैं। दोनों के वोट एक-दूसरे को स्थानांतरित हों, यह सबसे बड़ी चिंता दोनों ही दलों के नेताओं को सता रही है। यही कारण है कि मंच से ही सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने बसपा नेत्री मायावती का सम्मान करने की बात अपने कार्यकर्ताओं से कही और फिर मायावती ने भी समाजवादी कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाया।
मैनपुरी की रैली में मायावती ने जय भीम और जय लोहिया का नारा भी लगवाया। यह नारा दोनों दलों के वैचारिक गठबंधन का भी प्रतीक है। अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह वाकई हकीकत बन रहा है। अपने प्रथम सोपान में जनमानस में भाजपा कुछ हद तक यह बात जनता तक पहुंचाने में सफल हो गयी लगती है कि कमसे कम यह मोदी जी का ही भय था कि आज सभी दल व नेता अपना अस्तित्व बचाने के लिए एकजुट हो रहे हंै। इन सभी दलों ने जितने पाप किये हैं अब उन सभी पापों को समाप्त करने के लिए उन्हें देशहित का नाम दिया जा रहा है। यह सभी दल पाप के कामो में काफी गहराई तक डूबे हुए हैं।
सपा और बसपा के कार्यकाल का सबसे भयावह दौर प्रदेश की जनता ने अच्छी तरह से देखा है। समाजवादी पार्टी की सरकार ने अयोध्या को हिंदू कारसेवकों के खून से रंग दिया था। समाजवादी कार्यकाल में मुजफ्फरनगर का भवायह दंगा आज भी लोगों के जेहन में कौंध रहा है। सपा और बसपा दोनों ही दलों की सरकार श्रीरामजन्मभूमि को निशाना बनाकर किये गये आतंकी हमलों के जिम्मेदार आतंकियों को निर्दोष युवक बताकर उनको छुड़ाने का असफल प्रयास करते रहे। वह तो भला हो सतर्क हाईकोर्ट व न्यायपालिका का कि कोई आतंकी छूटकर बाहर नहीं आ पाया। दोनों ही दलों की सरकारों में प्रदेश भर में जमकर हिंदू उत्पीड़न होता रहा है। दोनों ही सरकारों में दूरदराज के गांवों व कस्बो आदि में हिंदू जनमानस अपने धार्मिक व मांगलिक कार्यक्रमों में लाउडस्पीकर नहीं बजा सकता था, जिसे कारण कई बार सांप्रदायिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी।
सपा का शासनकाल हिंदू जनमानस के लिए एक बहुत ही भयावह युग की याद दिलाता रहा है। खुद बसपा नेत्री मायावती का कहना रहा है कि समाजवादी सरकार में तो रोज ही दंगे और महिलाओं व युवतियों के साथ बलात्कार आदि की भयावह घटनाओं को अंजाम दिया जाता था। आज मायावती सपा शासनकाल में महिलाओं के साथ हुए व्यवहार को भूल चुकी हैं। मुजफ्फरनगर की महात्रासदी को भूल चुकी है। जब मायावती अपने साथ हुए अतिथि गृह गेस्ट हाउस कांड को भूल चुकी है तब बाकी अपराध तो उनकी नजर में होते ही रहते हैं। सपा और बसपा दोनों के शासनकाल की बहुत लम्बी लिस्ट है। यह मुस्लिम तुष्टीकरण का महागठबंधन है। यही कारण है कि अखिलेश और मायावती ने अपनी संयुक्त रैलियों की शुरूआत मुस्लिम बहुल देवबंद से ही की। अगर उन्हें पूरे समाज का हित रखना था, तो वह किसी हिंदू बहुल इलाके से भी अपने प्रचार की शुरूआत कर सकते थे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब दोनों दल अपनी सरकार के सभी घोटालों व आरोपों को दबायेंगे। आज वर्तमान समय में दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व पर अदालतों में जितने भी केस चल रहे हैं यह सब इन्हीं लोगों के कारण ही चल रहे है। सपा परिवार पर आय से अधिक संपत्ति का केस तो कांग्रेस के एक नेता ने ही लगाया था और 2013 में तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने वह केस समाप्त करवा दिया था। यह दोनों ही दल अथाह भ्रष्टाचार, घोटालों तथा भयानक मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर अपनी सरकार चलाते रहे हैं। हिंदू जनमानस को मतदान करते समय यह बात अच्छी तरह से याद रखनी चाहिए कि समाजवादी दल ने हिंदुओं पर गोलियां बरसाई हैं वहीं बहिन मायावती ने 2017 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम तुष्टीकरण व अयोध्या पर अपना विचार व्यक्त करने के लिए एक पुस्तिका छपवायी थी। उस पुस्तिका में अयोध्या पर मायावती के विचार स्पष्ट हैं। इन सभी दलों का एकमत विचार है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद ही फिर से बनवायी जाये। ये सारी बातें हिंदू जनमानस को अच्छी तरह से याद कर लेनी चाहिएं।
यह सभी लोग आज केवल अपने ध्वस्त हो रहे किलों का बचाने के लिए एक हो रहे हैं। यह चुनाव सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के जीवनकाल का अंतिम चुनाव है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को शून्य मत मिले थे और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा 48 व बसपा 19 सीटों पर ही निपट गयी थी। 2014 के बाद से लगातार बसपा के कई बड़े नेता प्रतिदिन पार्टी छोड़कर भाजपा व कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। गठबंधन बन जाने के बाद जिन नेताओं का अब टिकट मिलना असंभव हो गया है, वह भी लगातार दोनों ही दलों के नेता बहत तेजी के साथ दलबदल कर रहे हैं। सपा और बसपा के कई नेता अपनी परंपरागत दलों को छोड़कर कमल,हाथ या फिर चाचा शिवपाल के साथ जा रहे हैं। दोनों ही दलों के संगठन को प्रतिदिन कोई न कोई करारा झटका लग रहा है।
आज की तारीख में दोनों दलों का संगठन कमजोर है। ये सभी लोग अपना अस्तित्व बचाकर रखने के लिए ही महागठबंधन करके चुनाव लड़ रहे हंै। ये सभी घोर परिवारवादी, जातिवादी, महाभ्रष्टाचार के जनक व मुस्लिम तुष्टीकरण के पैरोकार हैं। हिंदू जनमानस को मत देने से पहले महागठबंधन का पूर्व इतिहास अवश्य याद रखना चाहिए। ये लोग कांवड़ यात्रा का विरोध करते हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने कांवड़ यात्रियों की पुष्पवर्षा का विरोध किया था और इन दलों के गुंडे उन पर हमले भी करते रहे हैं। अतः हिंदू जनमानस को इन दलों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए। यह दल न तो अयोध्या में मंदिर बनने देंगे और नही हिंदू बहिन- बेटियों को जीने देंगे।

— मृत्युंजय दीक्षित