वोह दिन !

आज पहली दफा किसी ने अकबर से उस की पिछली ज़िंदगी के बारे में पूछा था। अकबर अब 80 साल का बज़ुर्ग हो चुक्का था। बाबा जी, मैं पाकिस्तान के उस इतहास को जानना चाहता हूँ कि पाकिस्तान बन जाने के बाद किया हुआ था, मुझे मलूम है कि आप भी भारत से यहाँ आये  थे, अफ़ज़ल ने पुछा था। सुना है, आप भारत के पंजाब में रहते थे और सभ कुछ छोड़ कर यहाँ आये थे ! आप को कुछ याद है, आप कैसे आये थे  !                                                                                                       अकबर ने एक ठंडी सांस ली और बोला, बेटा, वैसे तो मैं कभी कभी लोगों को बताया करता था कि हम इंडिया में रहते थे लेकिन आज तू ने मेरी सारी कहानी ही जानने को पुछा है तो सुन, मैं सिर्फ दो साल का था जब पाकिस्तान बन गया। मेरे होश संभालने तक की बातें मुझे बहुत बाद में ही पता चलीं क्योंकि दो साल के बच्चे को इतना याद नहीं रह सकता। पाकिस्तान बन गया था और दोनों तरफ खून की नदिआं बह रही थीं। लाहौर की तरफ से हिन्दू सिखों को मारा जा रहा था और वोह दौड़ कर भारत की तरफ आ रहे थे। सुना था कि एक गाड़ी हिन्दू सिखों की लाशों से भरी हुई भारत पहुंची थी और अब भारत के हिन्दू सिख भी मुसलमानों को मारने लगे थे। गाँवों के गाँव उजड़ गए थे और मुसलमान खेतों में छुप छुप कर जाने बचा रहे थे। परिवारों के सदस्य एक दूसरे से बिछुड़ गए थे। जिस ने जिधर देखा, भाग गया। मेरी माँ, भाई बहन मुझे गोद में लिए भाग रहे थे लेकिन मुझे संभालना उन से मुश्किल हो रहा था और दूसरे मुझे बुखार बहुत था। मजबूरी में मेरी माँ ने मुझे एक धान के खेत में लिटा दिया और रोते हुए जान बचाने के लिए सभी भागने लगे। जोरों की बारश हो रही थी। बारश हो रही थी और दो दिन मैं वहीँ पड़ा रहा। फिर अचानक मैं रोने लगा। रोने की आवाज़ सुन कर दो आदमी मेरी तरफ आये और मुझे उठा लिया और घर ले आये। चांदी के कुछ गहने मेरी कलाईयों पर देख कर वोह समझ गए कि मैं किसी मुसलमान का बेटा हूँ। उन्होंने मुझे दूध बगैरा पिलाने की कोशिश की लेकिन मैं बेहोश था और दूध मेरे मुंह में जा नहीं रहा था। उन्होंने सोचा कि यह बचेगा नहीं और मुझे वहीँ धान के खेत में छोड़ आये, यह सोच कर कि शायद मेरे माँ बाप मुझे लेने के लिए आएं। पता नहीं कितनी देर मैं वहां पड़ा रहा, जब एक शख्स मुझे उठा कर अपने घर ले आया और यही शख्स था जिस के कारण मैं आज भी ज़िंदा हूँ। शख्स का नाम था हरनाम सिंह। यह एक सिख परिवार था। हरनाम सिंह की पत्नी का नाम था रुक्मण। यह दोनों मेरे माँ बाप बन गए और मुझे तब तक इस बात का पता नहीं चला जब तक कि पंदरा साल का नहीं हो गया। जब मुझे घर ले आये तो अभी भी मैं कुछ नहीं खा रहा था। दूसरी सुबह रुक्मण, मेरी माँ ने, जिस को अब भी मैं सगी माँ की तरह याद करता हूँ, एक दिन एक बड़े मट्टी के बर्तन में जमे हुए दही से माखन निकालने की गरज़ से इस में मधानी चालानी शुरू की तो उस ने मुझे गोद में ही बिठा लिया और दही रिड़कन के लिए मधाणी चलाती रही। जब माखन निकल आया तो वोह बर्तन से माखन निकाल कर पास पड़े छोटे बर्तन में डालने लगी। मैंने उछल कर माखन की तरफ हाथ डाला और कुछ पकड़ कर मुंह में डाल लिया और खाने लगा। रुक्मण बोली, ओह बेटा, तू तो माखन से ही पला हुआ लगता है और मुझे माखन खिलाने लगी। अब रुक्मण, मेरी माँ हर रोज़ मुझे माखन में शक़्कर डाल कर खिलाने लगी और दिनबदिन मैं अच्छा होने लगा। रुक्मण के दो बेटे और चार बेटीआं थीं और वोह सब मुझे छोटा भाई समझने लगे। मैं भी एक आम घर की तरह रहने लगा और बचपन की शरारतें भी करने लगा लेकिन सभी मुझे घर का लाडला रखने लगे। यहाँ मैं यह बता दूँ कि यह लोग खेती करते थे लेकिन मुझे कोई ख़ास काम करने नहीं देते थे। फिर एक दिन गुरदुआरे में ले जा कर मेरे सर पर पगड़ी बांध दी गई और सभ मुझे सोहन कह कर बुलाने लगे।धीरे धीरे मैं पाठ करना सीख गया और जब मैं घर में पाठ करता तो सभी बहुत खुश होते।

                            जब मुझे स्कूल में दाखल किया गया तो मैं शरारतें बहुत किया करता था। मास्टर जी मुझे बहुत पीटा करते थे। शरीर से तकड़ा होने के कारण सब बच्चे मुझ से डरा करते थे। पढ़ने में मुझे कोईं ख़ास रूचि नहीं थी। इस लिए गिआरा बारह साल की उमर में ही मुझे स्कूल से हटा लिया गया और खेतों में काम करना शुरू कर दिया। हरनाम सिंह, मेरे बापू ने मेरी सिहत को देखते हुए मुझे एक पहलवान का शागिर्द बना दिया और वोह मुझे कसरत करवाने लगा। दूध घी घर में मुझे सभ से ज़्यादा दिया जाता लेकिन हल चलाने से वर्जित कर दिया गया क्योंकि मेरे बापू का कहना था कि हल चलाने से लड़कों की टांगें टेहड़ी हो जाती हैं। बापू मुझे पहलवान बनाना चाहते थे और मैं भी जोर शोर से कसरत किया करता था। सभी बहनों की शादी हो गई थी लेकिन भाई अभी कुंवारे ही थे। बापू बूढ़ा हो चुक्का था। एक दिन उस ने मुझे अपने पास बुलाया और बोला, बेटा कुछ बातें बता रहा हूँ, ध्यान से सुनना । एक तो अपनी बहनों के सुसराल जल्दी जल्दी नहीं जाना, तीन चार साल बाद जाना और एक रात से ज़्यादा वहां नहीं रहना, दूसरे अपने भाईओं से कभी भी झगड़ा नहीं करना और गाँव में भी ऐसा कोई काम नहीं करना जिस से हमारे घर की इज़त पर दाग लग्गे। अपने भाईओं के साथ मिल कर रहना। इस के कुछ दिन बाद ही बापू इस दुनिआं से चले गए। कई दिन तक मैं रोता रहा। बापू के नज़दीक मैं बहुत था। माँ मुझे सांत्वना देती हालांकि वोह खुद भी तो इस ही पीड़ा से गुज़र रही थी। माँ की यह पीड़ा भी कुछ दिनों के बाद ही खत्म हो गई जब एक दिन रास्ते पर भागे आते एक साँड ने उसे सींगों पर उठा कर ज़मीन पर पटक दिया। मेरी दुनिआं में अंधेर हो गया। कई दिन मैं रोता रहा लेकिन कब तक ऐसा चलता।
                  दिन बीतने लगे। एक दिन मन बहुत उदास था, बड़ी बहन को मिलने का मन बना लिया और एक दिन उस के सुसराल पहुँच गया। बहन ने खुश हो कर दूध पिलाया लेकिन आज वोह कुछ चुप्प चुप्प सी थी। दूसरे दिन सुबह ही वोह मेरे पास आई और मुझे मेरे बारे में सभ कुछ बता दिया की बापू मुझे खेत से उठा लाया था और मैं किसी मुसलमान की औलाद हूँ। सुन कर मेरे होश उड़ गए और वहां से जाने लगा। बहन मुझे रोटी खाये बगैर जाने नहीं देती थी लेकिन मैं पागल सा हो गया था और दौड़ आने को मन हो रहा था। बहन मिनत करने लगी की उसे मुआफ करदे और रोटी खा के जाऊं।  आखिर रोटी खा के मैं वहां से भाग आया। रात बड़ी मुश्किल से गुज़ारी। खेतों में काम करने को मन नहीं कर रहा था। घर में भाई मुझे पूछते कि मुझे किया हो गया था लेकिन मैं कोई जवाब न देता। तीन दिन बाद बहन अपने सुसराल से आ गई। उस ने कुछ गहने मेरी ओर बढ़ाये और बोली, ” भईया मुझे मुआफ करदे, यह गहने रख ले और जो मैंने तुझे बताया था उसे भूल जा, अब मुझे महसूस हुआ है कि तुझे यह बात बता कर मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। छोटे भैया मुझे मुआफ करदे, मैं तेरी गुनाहगार हूँ “,  मैं बहन के गले लग गया और रोने लगा कि उस ने क्यों मुझे बता दिया था। धीरे धीरे यह बात जैसे हवा में उड़ने लगी। मेरे दोस्त ही मुझे हंस कर कहते कि मैं तो मुसला हूँ। किसी ने यह बात पता नहीं कैसे आगे पहुंचा दी कि दो तीन महीने बाद एक पुलिस मैंन के साथ दो आदमी आये। एक बूढ़ा था और मुझे कहने लगा की वोह मेरा बाप है जो मुझे धान के खेत में छोड़ आया था और मुझे लेने आया था। गुस्से में मैंने उस को कहा की उस वक्त वोह कहाँ था जब मैं बुखार से इतने दिन बारश में पड़ा हुआ था। वोह रोने लगा और बोला बेटा, उस वक्त को न पूछ की उस वक्त किया किया हुआ था। मैंने उस के साथ जाने से इंकार कर दिया और घर चला आया। मेरे भाई पहले से भी ज़िआदा मुझे पियार करने लगे और बोले कि वोह मर जाएंगे लेकिन मुझे पाकिस्तान जाने नहीं देंगे।
            एक दिन एक थानेदार और दस बारह सिपाही कोर्ट आर्डर लिए मुझे लेने के लिए आ गए कि मुझे पाकिस्तान जाना है। रोते हुए भाईओं से मैं बिछुड़ गया, बहनों को मिल ही नहीं पाया। बॉर्डर तक पुलिस मेरे साथ रही की मैं कहीं दौड़ न जाऊं। बार्डर पार करके कुछ दिनों बाद मैं अपने सगे माँ बाप के घर पहुंचा। माँ ने मुझे कस कर गले लगा लिया और मुझे चूमने लगी। दिन बीतने लगे और माँ हर रात मुझे अपनी चारपाई पे मुझे अपने साथ ही एक बच्चे की तरह सुलाती और मेरे सर पर हाथ फेरती रहती। बचपन का वोह पियार जो उस से छिन गया था वोह अब पूरा कर रही थी। कहते थे, माँ की छातिओं में दूध उत्तर आया था, इतना पियार वोह मुझे कर रही थी। जल्दी ही मेरी शादी कर दी गई। दो बेटे हो गए और कुछ सालों बाद माँ बाप गुज़र गए। बेटे बड़े हो गए और पत्नी भी अल्ला के घर चले गई। बेटे निकम्मे साबत हुए और मुझे इस बुढ़ापे में अकेले छोड़ कर पता नहीं कहाँ चले गए। यह कहानी सुना कर अकबर ऊंची ऊंची रोने लगा। अफ़ज़ल की आँखों में भी आंसू थे। कुछ देर बाद अफज़ल बोला, बाबा जी आप अपना घर इंडिया में देखने जाएंगे ? बेटा अब  तो भाई बहनों के बच्चे भी बूढ़े हो गए होंगे, कौन पहचानेगा मुझे वहां, अकबर बोला। वोह घर और उन के बच्चे तो होंगे ही, मुझे यकीन है कि उन को सभ कुछ पता होगा, अफ़ज़ल ने जवाब दिया। हां, हो सकता है लेकिन इस उमर में मुझे कौन ले जा सकेगा। अफ़ज़ल बोला, बाबा मैं तुझे ले जाऊँगा लेकिन इस काम के लिए कुछ वक्त लगेगा क्योंकि भारत का वीज़ा लेना पड़ेगा। अकबर की आँखों में चमक सी आ गई और वोह उन दिनों के ख्यालों में गुम हो गया।
            कुछ दिनों बाद अफ़ज़ल, बाबा अकबर को यह खुशखबरी देने चल पड़ा कि भारत का वीज़ा मिल गया था और अकबर भारत जाने को त्यार रहे। जब अफ़ज़ल, बाबा अकबर के घर पहुंचा तो देखा, कुछ लोग अकबर की चारपाई के इर्द गिर्द खड़े थे और एक ने बताया कि अकबर अब इस दुनिआं में नहीं रहा था।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.