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वेदों में अग्निहोत्र का विधान इसका ईश्वरप्रोक्त होने का प्रमाण

ओ३म्

वेदों का आविर्भाव सृष्टि के आरम्भ में हुआ था। अन्य सभी मत-मतान्तर विगत लगभग 2500 वर्ष व उसके बाद प्रचलित हुए हैं। मत-मतान्तरों के आविर्भाव पर जब हम विचार करते हैं तो उसका कारण अविद्या सिद्ध होता है। महाभारत काल के बाद समस्त संसार में ज्ञान-विज्ञान का लोप होकर अविद्या तिमिर का प्रसार हुआ जिससे लोग अवैदिक व अज्ञानपूर्ण कार्य करने लगे। अविद्या के कारण अन्धविश्वास बढ़ते गये जिससे मनुष्य को सामान्य जीवन व्यतीत करने में असुविधा होने लगी। इस समस्या के समाधान के लिये तत्कालीन पुरुषों, चिन्तक व विचारकों ने अपनी-अपनी मति व बुद्धि के अनुसार उनको उपलब्ध ज्ञान का प्रचार करने का प्रयास किया जिसने बाद में मत-मतान्तर का रूप ग्रहण कर लिया। सभी मतों की पुस्तकों की परीक्षा करने पर एक सामान्य बात दृष्टिगोचर होती है कि वेद व ऋषियों के ग्रन्थों के अतिरिक्त महाभारत काल के बाद ऐसा कोई मत उत्पन्न नहीं हुआ जिसमें अविद्या न हो। यदि इन मतों में अविद्या न होती तो किसी को भी कोई कष्ट व परेशानी न होती। अविद्या के कारण ही इन मतों व इनसे भिन्न मतों के मानने वालों के बीच समस्यायें उत्पन्न होती गईं। लोगों को इन समस्याओं का मूल कारण पता नहीं चला। नये-नये लोग उत्पन्न होते गये और नये-नये मतों का प्रचलन होता रहा। कुछ मतों में कट्टरता के कारण उनमें अधिक मतों व उनकी अधिक शाख्चाओं का आविर्भाव वा प्रचलन नहीं हुआ तथापि सभी मतों की कुछ शाखायें अविद्या व अन्य कारणों से उत्पन्न हुईं और आज तक ज्ञान व विज्ञान की वृद्धि होने पर भी उनमें परस्पर सौहार्द व मेलजोल स्थापित नहीं हो सका है। महाभारत के बाद जो मत अस्तित्व में आये, उनमें से किसी में अग्निहोत्र देव-यज्ञ का विधान उल्लेख नहीं है। इसका कारण उन मतों का मनुष्यों से उत्पन्न होना जो स्वभाव प्रकृति से अल्पज्ञ होते हैं, होना है। अल्पज्ञ का अर्थ एकदेशी आत्मा होता है जो सर्वव्यापक सर्वज्ञ परमात्मा के समान निर्भ्रान्त ज्ञान को कदापि प्राप्त नहीं हो सकता। ईश्वर भी इस व्यवस्था को बदल नहीं सकता है। यह भी तथ्य है कि ईश्वर सृष्टि के आरम्भ में एक ही बार चार ऋषियों को उत्पन्न कर उन्हें एक-एक वेद का ज्ञान देता है। उसके बाद प्रलय पर्यन्त वह किसी मनुष्य या विद्वान को ज्ञान नहीं देता।

अग्निहोत्र करने की आज्ञा वेदों में की गई है। वेद परम पिता ईश्वर का ज्ञान है। मनुष्यों का यह सामर्थ्य नहीं कि वह वेदों की रचना कर सकें। मनुष्य अनेक प्रकार की रचनायें करने में समर्थ है। उसने कम्प्यूटर, वायुयान, रेलगाड़ी, बडे-बड़े भवन, जलयान, मोबाइल फोन, टीवी आदि नाना प्रकार के जटिल कार्यों को करके दिखाया है। इतना होने पर भी मनुष्य वा वैज्ञानिक मनुष्य की आंख, नाक, कान, अंगुली, इन्द्रियां, मन बुद्धि आदि मानव शरीर के अंग-प्रत्यंगों को कभी नहीं बना सकते। इसी प्रकार वेद ज्ञान की उत्पत्ति भी मनुष्य कदापि नहीं कर सकते। मनुष्यों ने अनेक मत चलायें हैं परन्तु वह सभी अविद्या से युक्त हैं और विष सम्पृक्त अन्न के समान त्याज्य हैं। परमात्मा की कृति निर्दोष होती है। वेद में कही सभी बातें वा मान्यतायें सत्य एवं सृष्टि क्रम सहित विज्ञान के भी अनुकूल हैं। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने ज्ञान दिया था। वेद वही ज्ञान है। वेदों में अग्निहोत्र की आज्ञा होने से सभी मनुष्यों का कर्तव्य हैं कि वह दैनिक यज्ञ किया करें। जो नहीं करते वह ईश्वर की आज्ञा तोड़ने के दोषी होते हैं। प्राचीन काल में सभी लोग यज्ञ किया करते थे। यहां तक कि राम व कृष्ण जी भी यज्ञ किया करते थे। इसके प्रमाण रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध होते हैं। यज्ञ क्यों किया जाता है और इससे क्या लाभ होते हैं, इसके लिये महर्षि दयानन्द ने पंचमहायज्ञ विधि में जो कहा है, उसे हम प्रस्तुत करते हैं।

महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि अग्नि वा परमेश्वर के लिए, जल, और पवन की शुद्धि, वा ईश्वर की आज्ञा पालन के अर्थ होत्र-जो हवन, अर्थात् दान करते हैं, उसे “अग्निहोत्र” कहते हैं। केशर, कस्तूरी आदि सुगन्ध, घृत-दुग्ध आदि पुष्ट, गुड़-शर्करा आदि मिष्ट तथा सोमलतादि रोगनाशक ओषधि, जो ये चार प्रकार के बुद्धि वृद्धि, शूरता, धीरता, बल और आरोग्य करनेवाले गुणों से युक्त पदार्थ हैं, उनका होम करने से पवन और वर्षा-जल की शुद्धि करके शुद्ध पवन और जल के योग से पृथिवी के सब पदार्थों की जो अत्यन्त उत्तमता होती है, उससे सब जीवों को परम सुख होता है। इस कारण उस अग्निहोत्र कर्म करनेवाले मनुष्यों को भी जीवों का उपकार करने से अत्यन्त सुख का लाभ होता है तथा ईश्वर भी उन मनुष्यों पर प्रसन्न होता है। ऐसे-ऐसे प्रयोजनों के अर्थ अग्निहोत्रादि का करना अत्यन्त उचित है।

यज्ञ करने से मनुष्यों को अनेक लाभ होते हैं। ईश्वर की आज्ञा का पालन करने से हम पाप करने से बचते हैं तथा यज्ञ के रूप में जिसे ऋषि दयानन्द महायज्ञ कहा है, हम पुण्य के भागी होते है। यज्ञ से वर्षा जल व वायु की शुद्धि होने से मनुष्यों की अनेक प्रकार के साध्य व असाध्य रोगों से रक्षा होती है। वह स्वस्थ रहने से दीर्घायु एवं बलवान होते हैं। रोगरहित, स्वस्थ तथा बलवान मनुष्य अधिक सुखी होता है। यह सबसे मुख्य लाभ यज्ञ करने से मनुष्यों को मिलता है। मनुष्य का परजन्म भी यज्ञ करने से सुधरता है। यज्ञ ईश्वर वा मोक्ष प्राप्ति में भी अग्निहोत्र यज्ञ सहायक है। यज्ञ से किसी का अपकार नहीं होता अपितु सभी जीवों वा मनुष्य आदि प्राणियों को अनेक प्रकार के लाभ यज्ञ से होते हैं। यज्ञ करने पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। वर्षा का जल खेतों वा कृषि कार्यों के उत्तम खाद का काम करता है। वर्षा जल से उत्पन्न अन्न की गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है। यज्ञ करने से मनुष्य का आत्मा पवित्र भावों से युक्त होता है। यज्ञ से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना भी होती है जिसका लाभ ईश्वर से मनोवांछित सुख प्राप्ति के रूप में होता है। यज्ञ का एक लाभ यह भी होता है कि इससे निवास स्थान वा गृह का वायु गर्म होकर हल्का हो जाता है और रोशनदान, खिड़की व दरवाजों से बाहर चला जाता है। इससे जो अवकाश उत्पन्न होता है उसमें बाहर का शुद्ध वायु शीतल होने से भारी होता है वह घर के भीतर आता है। यज्ञ करने से रोग कृमि मरते व दूर भागते हैं। हमारा अनुभव है कि जिस परिवार में यज्ञ होता है और जहां देशी गाय के दूध का सेवन किया जाता है वहां घर व परिवार के सदस्यों में रोग बहुत कम होते हैं। अभाव दूर होते हैं तथा समृद्धि आती है। बच्चे शुद्ध व पवित्र बुद्धि वाले होते हैं और शिक्षा व विद्या की दृष्टि से वह अन्यों से अधिक उन्नत होते हैं। ऐसे अनेक लाभ यज्ञ वा अग्निहोत्र को करने से होते हैं।

हमारा यह अनुमान व मत है कि यदि वेद ईश्वर ज्ञान न होता तो उसमें ईश्वर के सत्यस्वरूप, जीवात्मा के स्वरूप व यज्ञ आदि का सत्य-सत्य वर्णन होना सम्भव नहीं था। ईश्वर, जीव, प्रकृति, यज्ञ व हमारे अन्य कर्तव्यों का ज्ञान कराने के कारण वेद हमारा परम धर्म है। हमें वेदों का स्वाध्याय करने के साथ दूसरों को वेदों को सुनाना चाहिये। हम जितना वेदों को जानते हैं उससे अधिक जानने का प्रयत्न करना चाहिये और जितना हम जान पाते हैं उतना दूसरों को भी बताना व पढ़ाना चाहिये। इससे हमें व अन्यों को लाभ होगा। जीवात्मा की सबसे बड़ी उपलब्धि सत्य ज्ञान की प्राप्ति ही होती है। धन की प्राप्ति व इसका लाभ तब तक ही होता है जब तक हम स्वस्थ रहते हैं। उसके बाद वृद्धावस्था व मृत्यु के बाद मनुष्य का ज्ञान, उसके संस्कार तथा कर्म पूंजी ही परलोक में सहायक होती है। हम जितना यज्ञ करेंगे उससे हमारे शुभ कर्मों का संचय बढ़ेगा और हम परजन्म में मोक्ष को न भी प्राप्त करें परन्तु श्रेष्ठ मनुष्य वा देवयोनि सहित अनेक प्रकार के सुखों को अवश्य प्राप्त होंगे, यह सुनिश्चित है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिये कि हम कभी वेद विरुद्ध जड़-मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष आदि अवैदिक कृत्यों को न करें और न ही इनमें विश्वास रखें अन्यथा हम अपने भविष्य के सुखों को कम व नष्ट करेंगे। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।

4 thoughts on “वेदों में अग्निहोत्र का विधान इसका ईश्वरप्रोक्त होने का प्रमाण

  1. नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। आपको व आपके परिवार के सभी सदस्यों को सादर सप्रेम नमस्ते। जयविजय पर आपकी प्रतिक्रिया देखकर प्रसन्नता हुई। आप पक्षपात रहित एवं निष्पक्ष विद्वान है, सत्य के ग्राहक हैं, यह देखकर प्रसन्नता होती है। मैं एक साधारण लेखक हूं। आपकी शंकाओं पर मैं अपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूं।

    यज्ञ करने से प्रदुषण दूर होता है यह मुझे सत्य प्रतीत होता है। यज्ञ में अग्नि को जलाया जाता है और इस बात का ध्यान रखा जाता है कि यज्ञ में शुद्ध समिद्धायें जिन्हें हम बोलचाल की भाषा में लकड़िया कहते हैं, प्रयोग में लायी जाती हैं। घुन व कीड़े लगी समिधाओं का प्रयोग यज्ञ में निषिद्ध है। इसके अतिरिक्त यज्ञ देशी गाय के घृत और अन्य तीन प्रकार की सामग्री का प्रयोग करके किया जाता है। साकल्य में पहली आयुर्वेदिक ओषधियां जैसे सोमलता, गिलोय, गुग्गल आदि आते हैं जिनसे अनेक प्रकार के रोग दूर होते हैं। दूसरे सुगन्धित पदार्थ होते हैं जैसे केसर, कस्तूरी, अगर व तगर आदि। यह भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद माने जाते हैं। तीसरे प्रकार के पदार्थों में देशी शक्कर का प्रयोग करते हैं इससे भी शरीर की पुष्टि होती है और यह देशी घृत की तरह अनेक प्रकार के हानिकारक रोग के किटाणुओं का नाश करती है।

    मनुष्य जहां रहता है उससे वायु व जल का प्रदुषण होने सहित भूमि का प्रदुषण भी होता है। भूमि पर चलने से छोटे छोटे कीड़े, चींटी आदि मरते हैं। चूल्हा व चक्की से भी वायुस्थ किटाणुओं की हानि होती है। इससे उऋण होने का कोई उपाय आधुनिक सभ्यता व परम्पराओं में नहीं है। इसीलिये वेदों में ईश्वर द्वारा किये गये विधान के अनुसार यज्ञ किया जाता है जिससे हम वायु में शुद्ध घृत व पुष्टिकारक पदार्थों को अग्नि में जलाकर उन्हें सूक्ष्म करके व सर्वत्र फैला कर आकाशस्थ वायु आदि को स्वच्द करने सहित मनुष्य आदि प्राणियों की रोगों व दुःखो ंसे रक्षा कर सकें। जो मनुष्य अपने घरों में यज्ञ करते हैं उन्हें यज्ञ से होने वाले लाभों का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। सभी निरोग वा स्वस्थ रहते हैं। सबकी बुद्धि पवित्र व समाज व देश हित के कामों में प्रवृत्त रहती है। सभी सम्पन्न भी देखे जाते हैं। मैं अपनी सम्पन्नता का कारण भी वैदिक विचारधारा व यज्ञ को मानता हूं। ईश्वर का सहाय भी यज्ञ करने वालों को अनेक कार्यों में प्राप्त होता है। हमारे देश का पतन यज्ञ व धर्म के कारण नहीं अपितु यज्ञ में अज्ञानपूर्वक व स्वार्थवश पशुओं की हत्या तथा धर्म में आये अन्धविश्वासों व पाखण्डों के कारण हुआ है। कई बार लोग भ्रमित करते व भ्रमित होते हैं कि भारत का प्राचीन काल में जो पतन हुआ उसका कारण यज्ञ व धर्म आदि कार्य थे।

    यज्ञ से पर्यावरण व वायु प्रदुषण होने वाले लाभप्रद प्रभावों पर मेरे पास एक लघु पुस्तिका है। उसकी स्कैनिगं करवाकर मैं कुछ दिन में आपको प्रेषित करने का प्रयास करुगां। इससे कुछ वैज्ञानिक तथ्य आपके सामने आ सकेंगे। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हुआ है कि यज्ञ से वायु प्रदुषण कम होता है। यदि एक यज्ञ से वायु प्रदुषण कुछ कम होता है तो हजारों लोगों के करने या सभी गृहस्थियों के करने से वायु प्रदुषण काफी कम जो सकता है और हम वायु एवं जल प्रदुषण की हानियों से काफी सीमा तक बच सकते हैं।

    जहां तक स्वच्छता की बात है हमें स्वच्छ रहना चाहिये। हमारे घर व चारों ओर का वातावरण स्वच्छ रहना चाहिये। इसके लिये हमें अपना कर्तव्य समझना व उसका पालन करना चाहिये। योग दर्शन में 5 नियम बताये गये हैं जिसमें पहला नियम व स्थान शौच का है। शौच का अर्थ अपने शरीर, वस्त्रों तथा अपने निवास व आस पास के स्थानों को स्वच्छ व पवित्र रखना है व साथ ही प्रदूषण न फैलाना भी है। जो प्रदुषण हमारे व दूसरों के द्वारा होता है उसे भी यज्ञ आदि कार्यों से दूर करने का हमें प्रयत्न करना चाहिये व आर्यसमाज के वैदिक धर्मी लोग करते हैं।

    संसार में सभी मनुष्यों का धर्म एक ही है। धर्म सत्य गुणों को धारण करने को कहते हैं। धर्म के दस लक्षण हैं धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेयं, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध यह धर्म के दस लक्षण हैं। क्या इन्हें हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि कहा जा सकता है? कदापि नहीं। सभी इन्हें मानते हैं परन्तु जहां से यह आये उस विद्वान व ग्रन्थ को स्वीकार नहीं करते? वेद किसी मनुष्य व गुरु द्वारा चलाया गया मत या मतान्तर नहीं है। वेद परमात्मा का सृष्टि की आदि में चार ऋषियों को दिया गया ज्ञान है। इसमें कोई बात साम्प्रदायिक नहीं है। इसका कारण वेद मनुष्यों द्वारा प्रवर्तित नहीं है। चार वेदों का 1.96 अरब वर्ष पुराने हैं। विश्व के सभी मनुष्यों के पूर्वज महाभारत काल तक वेदों को ही मानते रहे हैं। मत-मतान्तर तो विगत 2000 से 500 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आये हैं। आजकल भी भारत में अनेक गुरु नये नये मत अपने नाम से चला रहे हैं। वेदों में सबको मनुष्य अर्थात् मननशील व चिन्तनशील बनने और सत्य का आचरण करने की शिक्षा दी गई है। वसुधैव कुटुम्बकम भी वेद के विचारों की देन है। वेद सबको सुख व शान्ति का सन्देश देते हैं। मत-मतान्तरों के विचारों व मान्यताओं के कारण ही संसार में दुःख व अशान्ति का प्रसार हो रहा है। यदि सत्य मत वेद को अपना लिया जाये तो मत-मतान्तर की आवश्यकता ही नहीं रहती। जब तक मत-मतान्तर रहेंगे तब तक संसार में शान्ति नहीं हो सकती। हमें एक मत अर्थात् एक विचारधारा व समान सिद्धान्तों को बनाने सहित संगठित होना होगा। तभी विश्व में सुख व शान्ति होगी। अलग अलग विषयों के दो वैज्ञानिक कभी लड़ते नहीं है परन्तु दो मतों के मानने वाले लड़ते हैं। वह अपने अपने मत को अच्छा कहते हैं। यदि दोनों सत्य को स्वीकार कर लें तो एक मत वाला हो सकते हैं। यही बात ऋषि दयानन्द ने संसार को बतानी चाही थी और सबको सत्य स्वीकार करने के लिये कहा था। आर्यसमाज कोई मत नहीं अपितु वेद प्रचार का आन्दोलन है जो सत्य को मानने और असत्य को छोड़ने का प्रचार करता है।

    जब तक सृष्टि में मनुष्य है, समय तो बदलता रहेगा, परन्तु ईश्वर व जीवात्मा का सम्बन्ध वही रहेगा जो अनादि काल पूर्व से अब तक रहा है और भविष्य में अनन्त काल तक वैसा ही रहेगा। आज भी हमें ईश्वर व उसकी सहाय की आवश्यकता है। हमारे प्राणों को कौन चला रहा है? विज्ञान सीमित ज्ञान है। वह असाध्य रोगी को ठीक नहीं कर सकता और मरे हुए व्यक्ति में आत्मा को प्रविष्ट कराकर उसके प्राणों को नहीं चला सकता। यह बात ठीक है कि विज्ञान ने हमें बहुत सुविधायें प्रदान की है परन्तु ईश्वर व आत्मा को जाने, सत्याचरण व परोपकार किये बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता। आधुनिक समय में भी हमें ईश्वर व आत्मा का अध्ययन करने, ईश्वरोपासना करने, यज्ञ करने व परोपकार करने से खुशी व शान्ति मिलती है।

    वेदों की शिक्षा कभी अर्थहीन नहीं हुई। हम इसलिये पीटे व पराजित हुए क्योंकि हमने वेदों का अध्ययन छोड़ कर अपनी स्वार्थ सिद्धि को महत्व दिया था और असंगठित हो गये थे। हम वेदों को मानते हैं और संसार के सभी मतों को चुनौती देते हैं कि सत्य के निर्णय के लिये शास्त्रार्थ कर लो। कोई सामने नहीं आता। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में सब मतों के आचार्यों को सत्य का निर्णय करने व उसे स्वीकार करनेके लिये सबको आमंत्रित किया था। कुछ लोग आये और उनका समाधान हो गया। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में संसार के मतों की कुछ बातों का खण्डन वा समीक्षा की है। आज तक मत-मतान्तरों के लोग उनका उत्तर नहीं दे सके। इसका अर्थ जाना जा सकता है कि उनके पास उत्तर नहीं है। अब वेद धर्म ही ऐसा मत है कि जो सत्य, तर्क, युक्ति व ज्ञान विज्ञान के नियमों पर आधारित है। सत्य के ग्रहण के कारण ही आर्यसमाज ने मिथ्या मूर्तिपूजा एवं फलित ज्योतिष का विरोध किया था। इसके साथ ही जन्मना जाति व छुआछूत का भी विरोध किया था। आर्यसमाज ने अपने गुरुकुलों में दलितों को पढ़ाकर वेदों का विद्वान बनाया। बहुत से दलित गौरव व अभिमान से स्वयं को आर्य कहते हैं और संस्कृत पढ़कर पौराणिक पाखण्डी विद्वानों को संस्कृत में शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी है परन्तु किसी में उनसे संस्कृत में वार्तालाप व शास्त्रार्थ करने की योग्यता नहीं है। नालन्दा व तक्षशिला विश्वविद्यालयों में जो हुआ वह बौद्ध मत की मिथ्या अहिंसा के सिद्धान्त के कारण हुआ। उस समय वैदिक धर्म पौराणिकों के आलस्य व प्रमाद से विलुप्त हो चुका था। वैदिक धर्म होता तो यहां राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम, हनुमान, बाली, अभिमन्यु जैसे योद्धा होते जिनके होते यवनों में यह साहस नहीं हो सकता था कि वह अपनी आंख भी तिरछी कर सकें। आर्य राजा पृथिवी राज चौहान की हार का कारण भी दुष्टों को समय पर दण्ड न देना व माफ करना था। महाराणा प्रताप यवन राजा अकबार आदि से हमेशा अविजित रहे। शिवाजी की वीरता के किस्से आपने पढ़े होंगे। सोमनाथ मन्दिर का पतन हमारे फलित ज्योतिष के पण्डितों के कारण हुआ अन्यथा वहां भी हमारे क्षत्रिय राजा व सैनिक विजयी हो सकते थे इस रहस्य का अनावरण महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है। हम इतिहास में अपने लोगों की गलतियों से ही अपमानित हुए हैं। संगठन समान विचारों वाले लोगों में होता है। हम विचारधारा व स्वार्थों के आधार पर बंटे हुए हैं। हमारे यहां अज्ञानी पण्डितों ने अनेक मत-मतान्तर व विचारधारायें उत्पन्न कर दीं जिससे हमें नुकसान हुआ। आज जो हिन्दू मुसलमान व ईसाई बनाये जा रहे हैं वह छल, प्रपंच, लोभ व भय से बनाये जा रहे हैं। गरीब को रोटी चाहिये। आज धर्मान्तरण छुप कर किया जा सकता है। हमारी चुनौती है कि कोई भी मत अपने विचारों व सिद्धान्तों को सत्य सिद्ध करे, तो हम उसे स्वीकार कर सकते हैं। परन्तु सब असलियत जानते हैं। कोई समाने नहीं आता। हिन्दू असंगठित हैं और यही हमारे पतन व धर्मान्तरण का कारण है। राजनीति में इसका नग्न स्वरूप देखने को मिलता है।

    मैंने अपने विचार प्रकट किये हैं। यदि कोई शब्द या वाक्य आपको बुरा लगे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं। सादर।

    -मनमोहन आर्य

  2. मैंने आपकी यह प्रतिक्रिया अभी अभी देखी है। इसका उत्तर अपनी अल्प योग्यता से देने की कोशिश करूँगा। आज सायं तक या कल तक. आपको बहुत बहुत सादर नमस्ते। आज आपके दर्शन करके और आपके विचार पढ़कर बहुत अच्छा लगा। ईश्वर से आपके स्वस्थ जीवन की कामना करता हूँ. सादर।

  3. मनमोहन जी , मैंने आप का लेख पढ़ा .सौरी बहुत देर के बाद आप की लिखित पर दस्तक दी . मन में बहुत शंकाएं हैं . जो आप ने लिखा है किया ऐसा संभव हो सकताहै की यग्य करने से संसार की हवा पर्दूष्ण रहत हो सकती है . आज जो संसार में हो रहा है, हवा तो दूषत है ही, ज़मीन का पानी भी ज़हरीला हो गिया है और बोतलों का पानी पीने के लिए मजबूर हो रहे हैं .अगर घर में यग्य करके घर को साफ़ सुथरा रख भी लें, हमें तो बाहर की जिंदगी का सामना करना पड़ता है . आज तक मैंने यह भी देखा है की जो भी धार्मिक गुरु हैं, भले ही वोह कह दें की सभी धर्म अछे हैं लेकिन वोह अपनी बात को ही सही साबत करने की कोशिश करेंगे और उन के बताये रास्ते पर चलने के लिए ही प्रेरत करेंगे .समय एक जगह खड़ा नहीं रहता . आज वेदों का वोह युग नहीं रहा जब अधिआत्म्वाद ही परधान होता था और गुरु जंगलों में रहते थे और शिष्य वहां जा कर विद्या प्राप्त करते थे लेकिन वोह समय ही नहीं रहा . एक बात और , बेछ्क उस समय धार्मिक विद्या का ही बोल बाला था लेकिन लड़ाईयां महाभारत और रामायण के युग में भी हुई . हमारे वेदों की शिक्षा मीनींगलैस हो गई जब बिदेशों से मुठी भर अकर्म्न्कारीओन ने हमारी संस्कृति को झंजोड़ कर रख दिया .इस्लामिक हमलों ने तो बहुत कुछ बर्बाद ही कर दिया . हमारी नालंदा यूनिवर्सिटी की इतनी किताबें अग्न भेंट कर दी गई की उन को जलाने के लिए भी दो महीने लग्ग गए और आज आधे हिन्दू रह गए और शेष आधे मुसलमान बना लिए गए . हम कहाँ गलत हो गए, यही मेरी शंका है .

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