लघुकथा

परख

सुबह सुबह उज्जवल घर पहुंचा तो मां सुहासिनी के चेहरे पर अपने नाम के अनुरूप हंसी की उजली किरण बिखरी हुई थी, परंतु.. उज्जवल के चेहरे पर अपने नाम के विपरीत बिल्कुल अंधेरा। मां को समझ में नहीं आ रहा था कि घर आने की खुशी में बेटे को खुश होना चाहिए। इतना दुखी क्यों है? उसे चिंता होने लगी तो उसने पूछ लिया “क्या बात है उज्जवल, इतनी उदास क्यों लग रहे हो? सब ठीक तो है ना कॉलेज में?”
“हां.. मम्मा, कॉलेज में सब ठीक है, परंतु.. सफर में इतना बुरा अनुभव हुआ कि मन में खटास भर गई।”
“ऐसी क्या बात हो गई? तुम्हें तो नीचे वाली बर्थ मिली थी। तुम तो बहुत खुश थे, कहा भी था कि इस बार सफर का पूरा मजा लूंगा। फिर क्या हुआ?” मां ने आश्चर्य करते हुए कहा।
उज्जवल के माथे पर चिंता की लकीरें उभरी और चेहरे पर चिड़चिड़ापन का भाव उभरके आया। उसने चिढ़ते हुए कहा “क्या बताऊं मम्मी, नीचे की बर्थ में बैठा था। बाहर के दृश्य का आनंद ले रहा था। अचानक एक परिवार आकर मेरे सामने वाली बर्थ पर बैठा। एक अंकल आंटी के साथ उनकी एक लड़की थी। मुझे मुझे लगा एक अच्छा परिवार है चलो सफर अच्छा कट जाएगा। परंतु मुझे देखते ही उनके चेहरे पर घृणा और झुंझलाहट का भाव देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने नम्रता के खातिर उनसे बात करने और नमस्ते करने का प्रयास भी किया, परंतु.. उन लोगों ने तो मुंह फेर लिया। ऐसा क्यों करते हैं लोग लड़कों को देखकर। क्या लड़कें इंसान नहीं होते। उनके जज्बात नहीं होते। लड़कों के साथ तो इंसान जैसा व्यवहार ही नहीं करते हैं लोग।”
“ऐसी बात नहीं है बेटा सब लोग एक जैसे नहीं होते हैं। आए दिन खबर आती रहती है कि ट्रेन में किसी लड़की के साथ लड़कों ने गलत व्यवहार किया। इज्जत लूट ली या फिर ट्रेन से धक्का दे कर बाहर फेंक दिया। माता पिता के मन में अपनी बेटियों को लेकर असुरक्षा की भावना भर गई है। वे बेचारे भी क्या करें?” सुहासिनी ने अपने बेटे को सांत्वना देते हुए बात समझाई।
“गलती किसी और ने की और उसकी सजा किसी शरीफ को मिले यह कहां तक उचित है मां? लोगों को भी इंसान की परख करनी पड़ेगी। मैं कोई चोर उचक्का या बदमाश जैसा दिखता हूं क्या? पढ़ा लिखा नहीं लगता हूं क्या? पढ़े-लिखे शरीफ में और बदमाश में फर्क तो करना ही पड़ेगा।” उज्जवल ने अपनी मन की भड़ास निकाली।
“बेटा, कई बार बदमाश इतना शरीफ बन कर बैठ जाता है कि उसे देख कर कोई समझ ही नहीं सकता कि वह बदमाश है, लुटेरा है। कैसे कोई फर्क करेगा बताओ। इसलिए लोग पहले से ही सावधान हो जाते हैं। सफर में अनजान लोगों से बचकर रहने की कोशिश करते हैं लोग, खासकर लड़कों से। जैसे एक बुरी मछली पूरे तालाब को गंदा करती है वैसे ही कुछ लोगों के चलते शरीफ लोगों को भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। यह बहुत चिंताजनक बात है। एक तरह से देखा जाए तो यह तरह का मानसिक रोग है, नकारात्मक सोच है, जो हमारे समाज में वायरस की तरह फैल रही है।उस परिस्थिति में अगर मैं होती तो शायद मैं भी ऐसे ही आचरण करती।”
“पर.. मम्मी यह तो उस लड़के के लिए बहुत अपमानजनक बात है, जो लड़का असल में ही सच्चा और शरीफ है, शिक्षित है।”
“किसी के चेहरे पर यह लिखा नहीं होता है कि शिक्षित हूं और मैं शरीफ हूं। शिक्षित लोग सब के सब बेकसूर होते हैं? नहीं बेटा.. कई बार कई घटनाएं ऐसी भी पढ़ने को मिलती है जिसमें शिक्षित लोग ही बुरे कर्म करते हुए पकड़े जाते हैं।”
“फिर इस समस्या का समाधान क्या है मम्मी? हम बेचारे लड़के तो बेकसूर मारे जाते हैं। हमारी तो कोई शख्सियत ही नहीं है। कोई देखे और यह समझे कि चोर है, उचक्के हैं, कितनी अपमानजनक बात है।”
“यह बहुत विकट समस्या है बेटा.. पहले कहा न मैंने.. यह मानसिक बीमारी वायरस की तरफ फैल रही है चारों ओर। लोग अपनी बेटियों को लेकर डरे हुए हैं। उन्हें भी दोष नहीं दिया जा सकता। चलो तुम बुरा मत मानो इन सब बातों का, यह जीवन का एक हिस्सा बन गया है। इसे स्वीकार करो तो अच्छा है। तुम फ्रेश हो जाओ। मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे मनपसंद खाना बनाया है। सुबह से इंतजार कर रही हूं कि कब मेरा उज्जवल, उज्जवल सा मुखड़ा लेकर घर आएगा।” बेटे के मुखड़े पर हंसी लाने के लिए मां हंस पड़ी।
मां को हंसते हुए देख कर उज्जवल भी हंस पड़ा और अपने कान पकड़ते हुए कहा “मम्मा आगे से मैं कभी लोअर बर्थ नहीं लूंगा। मेरे लिए ऊपरवाली बर्थ उत्कृष्ट है। वहां पढ़ो या गाना सुनो.. कोई आँखें हमें घुरेगी नहीं और न ही किसी की आंखो की घृणा मुझे झेलनी पड़ेगी। कोई मुझे बदमाश चोर उचक्का समझे, यह मौका मैं दूंगा ही नहीं।”
बेटे की बात सुनकर मां हंस पड़ी और माहौल हल्का हो गया। बेटा भी खिलखिला कर हंस पड़..!!

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com

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