यादों के झरोखे से-4

वे दो रूमाल

उन दो रूमालों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा, कि कोई उनको इतना सहेजकर रखेगा और 15 साल बाद कोई उन पर ब्लॉग लिखेगा. भाई, यह तो अपनी-अपनी किस्मत है. 15 साल पहले मिले हुए दो रूमाल हों, या फिर 58 साल पहले मिली इनाम की अठ्ठनी हो, किस्मत साथ दे तो एक ब्लॉग क्या, एक उपन्यास तक भी लिखा जा सकता है. ख़ैर किस्मत-विस्मत की बात को छोड़िए और बात सुनिए उन दो रूमालों की दास्तां की.

बहुत दिनों से हम अपनी अंतरंग सखी मीता की बात नहीं कर पाए हैं. इन दो रूमालों के बहाने से नए साल के प्रारम्भिक दिनों में हम मीता को भी याद कर लेते हैं. मीता के इकलौते बेटे के विवाह का समारोह शुरु हो चुका था. बरात विवाह-स्थल पर पहुंच चुकी थी. दूल्हे की आरती उतारने और मिलनी की रस्म के बाद बरातियों को सम्मानपूर्वक अंदर ले जाया गया. दो बड़े-बड़े सुसज्जित कमरों में महिलाओं और पुरुषों के स्वागत का प्रबंध किया गया था. कमरे में चारों ओर कुर्सियां लगी थीं. एक कमरे में महिलाओं को और एक कमरे में पुरुषों को बिठाया गया था. उस समय अधिक ताम-झाम का चलन हुआ भी नहीं था और दूल्हे वालों में से किसी ने ऐसी कोई इच्छा भी व्यक्त नहीं की थी, सो दुल्हिन की ममी आदरपूर्वक हर महिला को नमस्ते कहकर, मिठाई के डिब्बे में से बर्फ़ी का एक पीस खिलाती और प्रतीक के रूप में एक रूमाल देती आगे चलती गईं. पुरुषों वाले कमरे में भी इसी तरह का कार्यक्रम चल रहा था. फिर स्नैक्स का, लावां-फेरों का, डिनर का सब कार्यक्रम विधिपूर्वक होता चला गया. विदा होकर डोली में दुल्हिन भी घर में आ गई थी. खुशी के हर पल को यादगार बनाता समारोह संपन्न हो गया. दूल्हा-दुल्हिन हनीमून से हो आए और अपने कर्मस्थली विदेश को प्रस्थान भी कर गए. दूल्हे की ममी का वह रूमाल उनके कीर्तन के बैग की शोभा बढ़ाने लगा.

अब तक तो एक ही रूमाल का ज़िक्र हो पाया है. अब सुध लेते हैं दूसरे रूमाल की और एक बार फिर चलते हैं विवाह-समारोह की ओर. यों तो आजकल मुंह दिखाई की रस्म का कोई अस्तित्व नहीं रहा है, क्योंकि एक तो अब घूंघट का रिवाज़ नहीं रहा है, दूसरे महिलाओं के भी कार्यरत होने के कारण विवाह के समय ही उपहार या लिफाफा देकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है, फिर भी दुल्हिन की मुंह दिखाई की कुछ-कुछ ज़रूरत पड़ ही जाती है. संयुक्त परिवार की सास अपने एक-दो बेटों को सपरिवार समारोह में भेजकर, खुद दूसरे दिन बहू की मुंह दिखाई की रस्म निभाती है. यहां भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा था. अपनी-अपनी सुविधानुसार महिलाएं आती जा रही थीं और बहू की झोली में कभी साड़ी, कभी शगुन के लिफाफे आदि का इज़ाफ़ा होता जा रहा था. इसी दौरान 86 साल की सीनियर मिसेज़ शर्मा भी आई थीं.

चलिए अब रूमाल की बात बाद में करते हैं, पहले 86 साल की सीनियर मिसेज़ शर्मा की बात ही कर लेते हैं. वे कॉलोनी की सबसे अधिक आयु की सबसे अधिक ऐक्टिव आंटी जी के नाम से विख्यात थीं. एक ही घर की तीन मंज़िलों में छह परिवार रहते थे. उनका और उनके पांच विवाहित बेटों के परिवार. वे कहने को एक बहू के साथ रहती थीं, लेकिन पता नहीं लगता था, किस बहू के साथ. अभी एक बहू की रसोई में जुटी हुई हैं, तो अभी दूसरी बहू के बच्चे को नहला रही हैं. कुछ देर बाद तीसरी बहू के साथ खाना खा रही हैं. सभी परिवारों को अपनी अलग-अलग सब सुविधाओं के होते हुए भी उस घर में अनुशासन, स्वच्छता, मेल-मिलाप और शांति का अखंड साम्राज्य था, यह बहुओं की सुशीलता या सुघड़ता की बदौलत था या आंटी के व्यक्तित्व का प्रभाव, हम दोनों कारकों का मिला-जुला प्रभाव समझकर आगे बढ़ते हैं. किसी के घर कीर्तन हो या विवाह-गीत समारोह ऐक्टिव आंटी के मनोहारी नृत्य के बिना काम नहीं चलता था. इस विवाह में तो उन्होंने जी भर नृत्य किया था, वह भी घूंघट काढ़कर. ख़ैर अब रूमाल की बात पर आ जाते हैं. दूल्हे की मां के विशेष आग्रह पर ऐक्टिव आंटी ने तीन बेटों को सपरिवार विवाह-समारोह में सम्मिलित होने के लिए भेजा था. निश्चय ही वे शगुन या उपहार देकर ही गए होंगे. दूसरे दिन शगुन डालने और अन्य महिलाओं की तरह ऐक्टिव आंटी भी आई थीं. उनका शगुन डालने का ढंग कुछ अलग-सा था. एक प्यारे-से रूमाल में शगुन की पोटली-सी बांधकर बहू की झोली में डाली और उसका माथा चूमकर ढेरों आशीर्वाद दिए. शगुन डालने का यह अलग-सा ढंग सास को भी अच्छा लगा और बहू के मन को भी भाया. बहू ने भी उस रूमाल को सहेजकर रख दिया.

अब आपको तो पता ही है, कि इन दोनों रूमालों को 15 साल हो गए हैं. इस बीच सास-बहू अनेक बार मिली हैं, लेकिन रूमालों की बात न करने लायक थी, न हुई. बहू-बेटे के बहुत आग्रह पर सास-ससुर कुछ समय के लिए विदेश गए. विवाह की 15 वीं सालगिरह पर सब साथ थे. उस दिन जाने क्या हुआ, कि सास ने बहू को अपना रूमाल दिखाकर कहा, ”बहू देखो, यह रूमाल आपकी ममी ने शादी के दिन प्रतीक के रूप में दिया था. 15 साल से मेरे कीर्तन के बैग में पड़ा है, कई बार धुल भी चुका है, पर अभी तक नया-का-नया ही पड़ा है.” बहू सुनकर खुश हुई. वह अपने कमरे में गई और दो मिनट बाद आकर बोली, ”ममी जी, यह रूमाल भी देखिए, मेरे को ऐक्टिव आंटी ने इसी में शगुन डालकर दिया था न, मेरा भी नया पड़ा है. पचासों रूमाल आए और गए, यह वैसा-का-वैसा ही है.” दोनों हैरान थीं.

आज मीता की यादों का पिटारा खुलने से उसे ये और ऐसी कई बातें याद आ रही थीं. अरे भाई, आज मीता के बेटे का जन्मदिन है और पिछले महीने ही उसके बेटे-बहू के विवाह की 15 वीं सालगिरह के पावन अवसर पर सास-बहू के बीच इन दो रूमालों का ज़िक्र हुआ था. आप सोच रहे होंगे, कि ऐक्टिव आंटी के घर के बारे में मुझे इतना कैसे पता! सो हम बताते चलें, कि 17 साल पहले मुझे आकाशवाणी से रेडियो पर ‘संयुक्त कुटुंब प्रणाली’ पर एक वार्ता देने के लिए आमंत्रित किया गया था, इसलिए मैंने उनसे और उनकी बहुओं से इंटरव्यू लिया था. हम उनके परिवार की कुछ दुर्लभ बातें भी आपसे कामेंट्स में शेयर करेंगे, जो मैंने रेडियो पर भी शेयर की थीं. फिलहाल आप आनंद लीजिए दो रूमालों की दास्तां का.
यह ब्लॉग January 9, 2016 को प्रकाशित हुआ था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।