ग़ज़ल

किसी की मोहब्बत में खुद को मिटाकर कभी हम भी देखेंगे
अपना आशियां अपने हाथों से जलाकर कभी हम भी देखेंगे
ना रांझा ना मजनूं ना महिवाल बनेंगे इश्क में किसी के
महबूब बिन होती है ज़िंदगी कैसी कभी हम भी देखेंगे
मधुशाला में करेंगे इबादत ज़ाम पियेंगे मस्ज़िद में
क्या सच में हो जायेगा ख़ुदा नाराज़ कभी हम भी देखेंगे
प्रेम तो पर्याय होता है अनिश्चितकालीन प्रतीक्षा का
बनकर अपनी उर्मिला का लक्ष्मण कभी हम भी देखेंगे
कहते हो ख़ुदा की कोई जाति नहीं होती अच्छा मज़ाक है
ऐसा ही एक मज़ाक तेरे साथ करके कभी हम भी देखेंगे
— आलोक कौशिक

परिचय - आलोक कौशिक

पेशा- अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन पता- कस्तूरी वाटिका, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार, पिन- 851101, Mobile number- 8292043472, Email address- devraajkaushik1989@gmail.com