कविता

तेरा खत

कासिद भी आया था, खत लेकर रोता हुआ
मैं खोलकर पड़ने की, ज़ुर्रत ना कर सका
वह रात का सपना वह दिल के मेरे वहम
सब कुछ मेरे ज़हन में जैसे घर कर गया
फिर भी न रह सका बिना खोले तेरा वह खत
खत पढ़ने की तो जैसे कोई सूरत ही नहीं थी
आँख से टपके आंसूओं ने सब समझा दिया
जात और धर्म के नाम पर क़ुर्बान हो गया प्यार
बस एक ही झटके में ज्यों सबकुछ बता गया
सुलगना ही तोअब बाकी है मेरी इस ज़िंदगी में
यही सोच कर मैंने, वो खत जला दिया
— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845