लघुकथा

लघुकथा – अपने ही घर में

“मिसेज मधुरिता से निवेदन करूँगा कि वह अपना साहित्यिक गौरव सम्मान स्वीकारने हेतु मंच पर पधारें।और हम सबको ,यह सम्मान स्वीकार कर ,कृतार्थ करें।”मंच उद्घोषक की आवाज सुन कर मधुरिता ने हल्की सी मुस्कान होठों पर सजाते हुये सभी का हाथ जोड कर अभिवादन किया और सधे पाँव से मंच की ओर चल दी.।
मंच पर सम्मान सर्टिफिकेट,शॉल,पुष्पमाला और फोटो क्लिक हो रहे थे। मधुरिता के होठों पर स्मित थी तो आँखों में अश्रु भी झिलमिला रहे थे।
जिन्हें सब खुशी का समझ रहे थे पर सच से अवगत वही थी। बेटे को साथ लेकर आई थी वह इस सम्मान समारोह में।पति से झूठ बोल कर ।घर परिवार के बाकी लोगो के लिए तो वह बेहया ही थी।
शादी के बाद समझ गयी थी मधुरिता कि उसके जीवन की राह कंटकों से ही गुजरेगी। पहले हिम्मत हार गयी।पर बच्चों के जन्म के बाद खुद ही खुदही हिम्मत बनी। जब भी घर से फुर्सत मिलती अपनी डायरी ले बैठ जाती कुछ पल अपने साथ बिताने। सास,ननद को शक हुआ कि शायद कुछ छिप कर खत लिखती है ।कहीं फँस न जाएँ।और एक दिन मौका देख उसकी खाना तलाशी ले कर डायरी और कुछ किताबें ,जो वह मायके से ले आती थी पढ़ने को,जला दीं।
बहुत ढ़ूंढा पर मिलनी तो थी नहीं।पर दिन रात के तानों ने समझा दिया कि उन बहुमूल्य साथियों का क्या हुआ ।
तनाव में रहते रहते डिप्रेशन में ही पहुँच गयी थी एक तरह से।
विप्लव की जाब लगी पहली सैलरी से एंड्रायड फोन गिफ्ट किया माँ को। दो दिन बैठ कर सिखाया ।आई डी बनाई।
धीरे धीरे मधुरिता डिप्रेशन से बाहर निकलने लगी।मोबाइल ने उसे ऐसी संस्थाओं से जोड दिया जहाँ वह अपना लेखन का शौक पूरा कर सकती थी।जरा सी सफलता उसे जोश से भर देती। पति के पूछने पर उसने बताया कि उसके लेखन को पसंद किया जा रहा है।और वह अच्छे रचनाकारों में अपनी पहिचान बना चुकी है।
पति ने उसे चरित्रहीन की उपाधि देते हुए तुरंत सब बंद करने की हिदायत दे दी न की सूरत में मोबाइल तोड़ने की धमकी भी।
अब वह सब से छिप के लिखती।
अनवरत् तनाव में रहने पर भी मधुरिता ने इस जज्बें को कम न होने दिया। विगत दिनों अपने जमा किये पैसों से उसने पुस्तक पब्लिश कराई।जो बेस्ट सेलर बुक में शामिल हो नये कीर्तिमान रच रही थी।पर इस सबके बारे में घर में सब अनभिज्ञ थे।
“बधाई हो मैम ….। क्या आप मेरी गुरू बनेंगी?”देखा एक नवयुवा उसको बुके देते हुए सम्मान से पूछ रहा है।
अपने ही घर में अपराधिनी सी मधुरिता दुनियाँ के लिए सफलता का पर्याय बन चुकी थी। दो अश्रु रुखसारों से गिर कर जमीन पर गिरते इस से पहले विप्लव ने अपनी हथेली पर संजो लिए।
पाखी 

मनोरमा जैन पाखी

मेहगाँव , भिंड (मध्य प्रदेश)