गीत/नवगीत

बसन्त

आया ऋतुराज बसन्त देख उल्लास प्रकृति में छाया ,
खिल गए कुसुम किंशुक पलाश चहुँ ओर हर्ष है छाया |

यह शस्य श्यामला धरा खिली रंग गयी विविध रंगों से |
लहराये लंहगा हरा – हरा चुनरी पीले बूटों से |

अमराई महके महर- महर कुहके मतवाली कोयल ,
गोरी के कंगना खनक उठे पैरों में छनके पायल |

यों लगे क्षितिज आलिंगन में धरती आकाश बंधे हैं ,
मानो अनंग के बाणों बिंध वासन्ती नेह पगे हैं |

गदराई सरसों इठलाती मंजरियाँ बौराई हैं ,
मधुरस में डूबी प्रकृति सभी पर तरुणाई छाई है |

गेहूँ की बाली झूम रही मन में आनंद भरा है ,
धरती ओढ़े पीली चूनर अम्बर भी खिला-खिला है |

भौरें गुन-गुन करके कलियों से करें प्रेम की बातें ,
मकरंद लुटाते फूल हँसे तितली पर नेह लुटाते |

फैली सुवास चहुँ ओर बहे है मन्द-मन्द पुरवाई ,
कलरव से गूंज उठा उपवन मन मे हुलसे फगुनाई |

स्वप्निल नयनों में आस नई मन में बजती बाँसुरिया ,
मन ‘मृदुल’ पिया की प्यारी मैं सखि नाँचू बन बाँवरिया |
© मंजुषा श्रीवास्तव’मृदुल’
लखनऊ,उत्तर प्रदेश

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016