सही मार्ग

कभी-कभी जिंदगी ऐसे-ऐसे करिश्मे दिखाती है, कि समझ में ही नहीं आता कि यह हुआ तो कैसे और क्यों हुआ! सुबह जब घर से ड्यूटी के लिए निकला था, तो घर की हालत यह थी-

”सुबह उठते ही पत्नि ने कहा- ”ए जी, सुनते हो, रमनवा बुखार में तप रह्यो है.”

मैंने सुनकर भी अनसुना कर दिया था. और करता भी क्या? बेटी के लिए रिश्ता देखने जाने के लिए सिर्फ़ 50 रुपये की जरूरत थी, मेरे पास 20 रुपल्ली तक नहीं थी. दवा क्या ख़ाक लाता!”

शाम को जब ड्यूटी से लौटा, तो नजारा बदला हुआ-सा था. बेटा गली में ही खेलता हुआ मिल गया था और पत्नी का चेहरा खिला-खिला लग रहा था. उसने छूटते ही बता दिया था- ”लड़के वाले खुद ही देखने चले आए थे और बेटी को पसंद कर गए हैं.”

मुझे सारे दिन की घटनाएं याद आने लगी थीं. एक घटना यह थी-

नहा-धोकर रोज की तरह मानसिक पूजा कर भगवान को अपनी कृपा के योग्य बनाने और सही मार्ग दिखाने के लिए निहोरा करके ड्यूटी के लिए निकल पड़ा था. आते ही एक बेंच पर एक लावारिस लेडीज पर्स दिखा. रेलवे स्टेशन पर लेडीज पर्स का मतलब था, कैश और ज्वेलरी का होना.

था तो आखिर मैं भी इंसान ही, ऊपर से दो लाचार बच्चों का पिता! नीयत डोलने में कितनी देर लगती भला!

”फिर पूजा-नैवेद्य के लिए तो तेरे पास रुपये नहीं हैं, मानसिक पूजा कर भगवान को अपनी कृपा के योग्य बनाने और सही मार्ग दिखाने के लिए निहोरा कैसे करोगे?” मन के एक कोने ने कहा.

”तेरी मानसिक पूजा से खुश होकर भगवान ने तुझे अपनी कृपा के योग्य बनने का एक स्वर्णिम अवसर दिया है. इस अवसर को हाथ से जाने देना किसी तरह उचित नहीं होगा.” मन के दूसरे कोने से आवाज आई.

”जिसका बैग छूट गया है, उसकी हालत की कल्पना की है?” तीसरा कोना चुप कैसे रहता!

मैंने उस बैग को सही उसके सही दावेदार तक पहुंचाने के लिए ऑफिस से मिले स्मार्टफोन से वॉट्सऐप पर बैग का फोटो खींचकर आगे के आदेश के लिए हैड क्वार्टर भेज दिया था.

मन के चौथे कोने ने सही मार्ग जो दिखा दिया था!

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।