आधुनिक भीष्म

आज न जाने क्यों पौराणिक देवव्रत की कथा याद आ गई! ये देवव्रत ही तो दृढ़ प्रतिज्ञा से देवव्रत भीष्म बने थे. एक देवव्रत और भी थे, जिनसे मेरी मुलाकात आज से लगभग पैंसठ साल पहले हुई थी.
ये देवव्रत भारत विभाजन के बाद सिंध छोड़कर हिंद में बसने के लिए आ गए थे. उनकी किस्मत देखिए, चार बच्चों के साथ खुद तो किसी तरह बचकर दिल्ली पहुंच गए, लेकिन धर्मपत्नि नहीं बच पाईं थीं.
नया देश, नई जगह, नये लोग, सामान रहित चार बच्चों संग समाना मुश्किल था. खाने-पीने का जुगाड़ नहीं था, सो सारा दिन दुआ-इबादत में ही निकलता था. दुआ में वे अपने प्रभु से एक ऐसी जीवन-संगिनी मांगते थे, जो बिना शर्त इन बच्चों को अपना ले.
”ऐसा जीवन साथी मिलेगा कहां से! तुम्हारी तपस्या इतनी तो नहीं है, कि तुम दृढ़ प्रतिज्ञ भीष्म बन सको?” मन ने लताड़ लगाई थी.
”मेरी तपस्या में भले ही इतना असर नहीं हो, लेकिन दुआ की ताकत तो असीम होती है!” नील गगन में सूरज की सुनहरी किरणों को असीम उजियारा फैलाते देख मन ने ही कहा था.
”उसी दुआ से मेरी मुलाकात संतना से हुई थी. मैंने संतना को अपनी गाथा सुनाकर ब्रह्मचर्य की दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ जीवन-संगिनी बनने का निवेदन किया था.” देवव्रत ने कहा था.
देवव्रत का नाम तो आधुनिक भीष्म नहीं पड़ सका, पर दुआ अपना असर दिखाने को प्रस्तुत थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।