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सम्मान

आज सुबह-सुबह हमने

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से जो अनमोल वचन निकाला, वह निकला-

 

पुस्तक या रचना में लेखक की आत्मा निवास करती है.
पुस्तक या रचना का सम्मान लेखक का सम्मान है.

 

इससे हमें लगा कि कामेंटेटर्स भी तो लेखक ही हैं. फिर हमारे पाठक-कामेंटेटर्स तो बहुत ही प्रबुद्ध हैं, क्या गज़ब की प्रतिक्रियाएं लिखते हैं! इन प्रतिक्रियाओं में उनके अंतर्मन की झलक दिखाई देती है. हमें लगा कि इन प्रतिक्रियाओं का सम्मान होना ही चाहिए. इन प्रतिक्रियाओं को आप भी पढ़ेंगे, तो आप भी पयही महसूस करेंगे.

अभी-अभी आपने ब्लॉग अनूठी जुगलबंदी (लघुकथा) पढ़ा. अगले दिन आपने दिलखुश जुगलबंदी-14 पढ़ा. इन दोनों ब्लॉग्स को आपने खूब पसंद किया. अब पढ़िए प्रतिक्रियाओं की जुगलबंदी.

 

 

ब्लॉग प्रतिक्रियाओं की जुगलबंदी की जरूरत क्यों पड़ी, इसका एक विशेष कारण है हमारे प्रबुद्ध पाठक. हमारे प्रबुद्ध पाठकों ने ब्लॉग दिलखुश जुगलबंदी-14 पर इतनी दिलकश याकि कहिए दिलखुश प्रतिक्रियाएं लिखीं, कि इन प्रतिक्रियाओं का सम्मान करना हमें आवश्यक लगा.

 

आगे बढ़ने से पहले हम आपको बता दें, कि हमारे बहुत-से पाठक तो हमारे नियमित पाठक हैं ही, हाल ही में कुछ नए पाठकों की प्रतिक्रियाओं की बात पहले कर लेते हैं.

 

 

ब्लॉग विश्व हास्य दिवस से हमारे साथ पाठक-कामेंटेटर Ravikant Yadav जुड़े. इन्होंने लिखा-
”good said.”

ब्लॉग कम्प्यूटर के कीबोर्ड में F1-F12 कीज़ में हमारे एक नए पाठक-कामेंटेटर हमारे साथ जुड़े. इनका नाम है- MAHENDRA PANWAR. इन्होंने लिखा-
”आदरणीय लीलाजी की बहुत ही उपयोगी आधुनिक रचना……..सादर धन्यवाद.”

ब्लॉग अनूठी जुगलबंदी (लघुकथा) से हमारे साथ एक और पाठक-कामेंटेटर ब्लॉगर Sushil Pandey जुड़े. इन्होंने लिखा-
”बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने.”

अब आते हैं ब्लॉग दिलखुश जुगलबंदी-14 की प्रतिक्रियाओं पर. सबसे पहले चंचल जैन जी ने लिखा-

”लीला दीदी शब्द ही जोड़ते हैं,
शब्द ही पल भर मे तोड़-मरोड़ देते हैं रिश्ते-नाते,
तोल-मोल कर बोलो.
शब्दोंको खुला मत छोड़ो.”

उसके बाद वे कई बार ब्लॉग पर आकर प्रतिक्रिया लिखती रहीं. उनकी एक प्रतिक्रिया इस प्रकार थी-

”लीला दीदी,आप की जुगलबंदी दिलखुश और रसभरी, सुहानी और सुभाषिणी है. बात-बात में जीवन का सारदर्शित हो रहा है.
सत्य से साक्षात्कार करवाते शब्द.
कितने मौलिक,
कितने तेजस प्रेम की झंकार कभी,
कभी है द्वेष की फूत्कार.
मिलन का आव्हान करते,
पल में ध्वस्त करें संसार,
कलम बड़ी तलवार से शब्द हैं तेज,
धारदार तोल-मोल कर जो बोले,
रसना से स्नेह-रस घोले,
मंगलवचन सदा ही बोले,
शुभकामनाओं संग डोले,
सप्त-सुरों से सजे सरगम,
जीवन में आये आनन्द-उमंग,
मधुर-मधुर हो जिस की वाणी मोहक मुस्कान,
हंसी ठिठोली जग जीत ले सुमधुरभाषिनी वाणी,
पर हो गर नियंत्रण,
मिट जायें हमारे सारे गम.”

काव्य में कितना सुंदर संदेश! वाणी पर नियंत्रण बहुत जरूरी है. वाह! चंचल जी, मजा आ गया.

सुदर्शन खन्ना जी ने अनूठी जुगलबंदी लिखी-
आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम. शब्दों की बानगी देखिए.
‘तुम्हें पहले ही कहा था आँखें उसकी जंगल हैं,
लौटते नहीं हैं फिर वोह, जो वहां पाँव धरते हैं’
‘जब शब्द जुगलबंदी करते हैं तो महफ़िल ख़ास होती है,
पढ़ने सुनने वालों के दिलों में एक आस होती है. ‘
‘जब शब्दों पर छाए मौसम का जादू,
तो शब्दों की लीला अनायास होती है’
‘थिरकते, नाचते, गाते शब्दों की जुगलबंदी ने मन मोह लिया है,
इस जुगलबंदी ने ह्रदय के तारों को छेड़ दिया है.’

सुदर्शन भाई, सचमुच आपकी इस अनूठी जुगलबंदी ने ह्रदय के तारों को छेड़ दिया. तभी तो हमारी कलम से निकला-

”जुगलबंदी एक गुलशन है,
जिसमें काव्य के फूल खिलते हैं,
इस अनोखे गुलशन की महफ़िल में,
अनेक महकीले पुष्प मिलते हैं,
कभी वे पुष्प सुदर्शन कराते हैं,
तो कभी प्रकाश फैलाते हैं,
कभी कुसुम नाम से पल्लवित होते हैं,
तो कभी रवि बनकर नभ को प्रज्ज्वलित करते हैं,
जुगलबंदी के इस मोहक गुलशन में,
कई नए सितारे भी चमकते हैं.”

आपने लिखा-
‘तुम्हें पहले ही कहा था आँखें उसकी जंगल हैं,
लौटते नहीं हैं फिर वोह, जो वहां पाँव धरते हैं’

हमारी कलम ने जवाब दिया-
”तुम्हें पहले ही कहा था आँखें उसकी जंगल हैं,
लौटते नहीं हैं फिर वोह, जो वहां पाँव धरते हैं,
तुम फिर भी चलते चले गए,
तुमने कहा हम वो नहीं जो जंगल से डरते हैं,
इसी निर्भयता नें तुम में साहस का संचार किया,
तुमने जंगली जड़ी बूटियों का व्यापार किया,
इसी व्यापार ने तुम्हें कहां-से-कहां पहुंचा दिया,
सच ही तो है, तुमने जंगल को गुलशन समझ लिया था,
अब तो पेड़ों से भी रुपये झरते हैं.”

आपने लिखा-
‘जब शब्द जुगलबंदी करते हैं तो महफ़िल ख़ास होती है,
पढ़ने सुनने वालों के दिलों में एक आस होती है.’

हमारी कलम ने जवाब दिया-
‘जब शब्द जुगलबंदी करते हैं तो महफ़िल ख़ास होती है,
पढ़ने सुनने वालों के दिलों में एक आस होती है,
वो भी कुछ सीख जाएंगे,
कुछ अच्छा-उपयोगी दुनिया को दे पाएंगे,
बस इसी तरह वे भी जुगलबंदी में रम जाते हैं,
भागते हुए वक्त के कुछ पल थम जाते हैं,
तब होती है जुगलबंदी के महफ़िल में रौनक,
अब आप लिखिए हम लौटकर आते हैं.’

प्रिय ब्लॉगर सुदर्शन भाई जी, फिर आपने कहा-
‘शब्दों का भी तापमान होता है,
ये सुकून भी देते हैं और जला भी देते हैं.’

हमारा जवाब था-
‘शब्दों का भी तापमान होता है,
ये सुकून भी देते हैं और जला भी देते हैं.
तापमान तो तापमान ही होता है,
चाहे -47 डिग्री हो या +47 डिग्री,
-47 डिग्री पर कंपकंपा देता है,
+47 डिग्री पर जला देता है,
उसी तरह शब्दों का जादू भी होता है,
कटु-सच्चे शब्द अपनी कड़वाहट से दुश्मनी बढ़ाते हैं,
मीठे-सच्चे शब्द अपनी मिठास से दोस्ती कराते हैं.
इसलिए शब्दों का प्रयोग तोल-मोलकर करो,
क्योंकि
शब्दों का भी तापमान होता है,
ये सुकून भी देते हैं और जला भी देते हैं.’

सुदर्शन जी की कलम ने लिखा-
‘शब्दों की ताकत को कम मत आंकिये —
छोटी-सी ‘हाँ’ और छोटी-सी ‘न’ पूरी ज़िंदगी बदल सकते हैं.’

इसके बाद प्रकाश मौसम जी लाइन पर आए, जो इस ब्लॉग में ह्मारे सहलेखक हैं. प्रकाश जी ने लिखा-

‘घंटी तभी कहलाती जब बजती है,
गीत तभी कहलाता जब गाया जाता है,
प्रेम तभी झलकता है जब किसी को दिया जाता है,
शब्दों की बारिश होती है,जब दो मन आपस में बातें करते है,
जुगलबंदी में मौसम भी साथ देता है.’
और
‘एक चुनौती,
प्रकाश की एक किरण-सी,
ज़रुरत है, बस दो शब्द प्यार भरे,
हिंदी के लिए, इस देश के लिए, जय हिन्दी.’
और
‘पत्तिया फिर घिर आई है,
आज फिर बहार आई है,
दर्द और कराह को भूल, उबरने की बारी आई है,
शब्द रूपी फलों से लहरा रहा है,
मेरे आँगन का एक पेड़.’

इंद्रेश उनियाल जी ने शब्दों की अनेकता में एकता पर बहुत गहरी बात लिख डाली-
आदरणीय लीला बहन एक ही वस्तु को अलग अलग शब्द दिये जाते हैं,
आंख से निकले तो आंसू,
बहाने लगे तो नदी,
रुक जाये तो झील,
जम जाये तो हिम,
जम कर बरसे तो ओले,
जमते-जमते बरसे तो बर्फबारी,
पर है तो पानी ही.’
वाह इंद्रेश जी! आपके तरकश में तो बहुत धारदार तीर निकले!

 

 

अभी कहां चल दिए आप! अभी तो इंग्लैंड से गुरमैल भाई की और कुसुम सुराना जी की दास्तां बाकी है. इंग्लैंड से गुरमैल भाई ने लिखी-

”बहुत मजेदार जुगलबंदी, लीला बहिन. गुरमेल भमरा.”

”प्रिय गुरमैल भाई जी, आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. जुगलबंदी बहुत मजेदार है और संदेशपरक भी. एक-एक शब्द सोच-समझकर लिखना-बोलना चाहिए, इसी में सबकी भलाई है.”

कुसुम सुराना जी ने लिखा-

‘लीला जी ! शब्दों के रामसेतु में गिलहरी का अदनासा योगदान!
शब्द ही ओंकार,
शब्द ही अर्हम्!
शब्द ही अजान, शब्द ही अरदास!
शब्द में सार,
शब्द में संसार!
शब्द में प्यार,
शब्द में व्यापार!
शब्द है वेदना,
शब्द है संवेदना!
शब्द है चेतना,
शब्द है साधना!
शब्द है दर्पण,
शब्द है समर्पण!
शब्द है त्राण,
शब्द है प्राण!
शब्द है बाण,
शब्द है खाण!
शब्द है प्रीत,
शब्द है रीत!
शब्द है गीत,
शब्द है मीत!’

वाह कुसुम जी! यह हुई न असली दिलखुश जुगलबंदी!

इसके अलावा शब्द पर जो उभरकर सामने आए, वे काव्य-रूप इस प्रकार हैं-
‘शब्दों से माला भी सजती है,
शब्दों से छुरियाँ भी चलती हैं,
शब्द से ही टपकता शहद,
शब्द से ही टपकता जहर,
शब्दों का है खेल अजब,
शब्द ही ढाते हैं गजब!’
और
‘शब्दों के इत्तेफाक में यूँ बदलाव करके देख,
तू देख कर ना मुस्करा, बस मुस्करा कर देख.’
और
‘बोल मीठे न हों तो हिचकियां भी नहीं आतीं,
घर बड़ा हो या छोटा,
अगर ‘मिठास’ न हो हो,
तो ‘इंसान’ क्या ‘चींटियां’ भी नहीं आतीं!’
और
‘रचनाकार के शब्दों को जब महत्व मिलता है,
ये पल, रचनाकार के जीवन के शानदार पलों में शामिल हो जाते है.
हृदय से दी जाने वाली शुभकामनाएं
और अधिक ऊर्जावान होने की एनर्जी भी देती हैं.’
और
‘धन्यवाद शब्द को बहुत छोटा मत समझो ऐ दोस्त,
यही तो वह शब्द है, जो दिलों को मिलाने की कुव्वत रखता है.’
और
मुस्कुराहट तो हमारी भी कम नहीं,
कसक भी हमारी नशीली है,
पूछ लो एक बार मधुमक्खी से,
जिनको लगती हमारी कसक भी महकीली है.’
और
सोच ही आपको बड़ा बनाती है..!!
यदि गुलाब की तरह खिलना चाहते है,
तो काँटों के साथ तालमेल की कला सीखनी होगी.’
और
‘मधुर शब्दों में कही हुई बात अनेक प्रकार से कल्याण करती है,
किंतु यही यदि कटु शब्दों में कही जाए,
तो महान अनर्थ का कारण बन जाती है.’
और
‘नरम शब्दों से सख्त दिलों को जीता जा सकता है,
गरम शब्दों से जीती बाजी को भी हारा जा सकता है.’
और
‘शब्द मर्यादा में रहें,
तो जीत का मजा आ जाता है.’
और
‘जब हम अकेले हों तो अपने विचारों को संभालें,
जब हम सबके बीच हों तो अपने शब्दों को संभालें.’

देखा आपने! शब्दों की जादूगरी ने कितने तरीकों से अपनी कारीगरी दिखाई है. यह जादूगरी हमारे पाठक-कामेंटेटर्स की सुरीली-सजीली कलम की सुरीली-सजीली कलाकारी है. पाठक-कामेंटेटर्स की प्रतिक्रियाओं का सम्मान करके हमारी कलम सम्मानित हुई है. एक बार फिर आप सबको बहुत-बहुत शुक्रिया और धन्यवाद.

 

इन प्यारी-प्यारी प्रतिक्रियाओं को देखकर बरबस हमारी कलम कह उठी-
”प्रिय ब्लॉगर प्रकाश भाई जी, आपने इस दिलखुश जुगलबंदी में शब्दों पर जो चर्चा शुरु की, उसे आपने और हमारे प्रबुद्ध पाठकों ने इतना परवान चढ़ा दिया है, कि हो सकता है इस ब्लॉग के कामेंट्स किसी शोध के लिए भी काम आ जाएं.”

आपकी क्या राय है?

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “सम्मान

  • लीला तिवानी

    जब तुम खुद का सम्मान करोगे तभी दूसरे भी तुम्हारा सम्मान करेंगे।
    सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान अहिंसा है।
    सभी सम्माननीय प्रबुद्ध पाठक-कामेंटेटर्स को हमारा शुक्रिया और धन्यवाद.

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