विक्लांघ लोग सर उठा कर जियें

मैं एक डिसेबल हूँ और घर में एक रौलेट जिस को तीन पहिओं वाला वाकिंग फ्रेम भी कह सकते हैं, के साथ चलता फिरता रहता हूँ। एक गंभीर रोग के कारण मेरे शरीर की शक्ती भंग होने से इस के बगैर मैं एक कदम आगे नहीं जा सकता क्योंकि मेरा बैलैंस बिलकुल ही ज़ीरो है। टांगों में वोह शक्ति नहीं है जो होनी चाहिए। किसी सहारे के बगैर खड़ा हो जाऊं तो ज़मीन पर गिर जाऊँगा। इस लिए यह रोलेट मेरी लाइफ लाइन है। इस की मदद से मैं अपने आप में संतुष्ट रह कर ज़िंदगी बसर कर रहा हूँ। एक दिन ऐसा हुआ कि मेरा पैर सलिप हो गया और रोलेट टेहड़ा हो गया और रोलेट तो नीचे गिरा ही,  मैं भी नीचे गिर गया। घर में कोई है नहीं था। चोट तो कोई ख़ास नहीं लगी लेकिन उठने के लिए मुश्किल से सोफे को पकड़ कर कुछ देर के बाद उठा। अब बात थी, अपने रोलेट यानी वाकर को उठाने की। कैसे उठाऊं क्योंकि इस के बगैर तो चलना ही मुश्किल था। कुछ देर सोचता रहा और फिर एक कोने में पढ़ी मेरी छड़ी जो रोलेट से पहले इस्तेमाल किया करता था, निगाह पढ़ी। मुश्किल से इस को पकड़ा और इस छड़ी की सहायता से अपने वाकर को उठा कर सीधा खड़ा कर दिया। कुछ देर सोचता रहा और फिर अचानक हंसी आ गई। एक बार कहीं पढ़ा था कि कभी कभी सहारे को भी सहारे की जरूरत पढ़ जाती है। आज मेरे साथ भी ऐसा ही हो गया था।

                मैं सोचने लगा कि यह रोलेट तो कुछ साल पहले ही बने हैं लेकिन पहले तो छड़ी का इस्तेमाल ही किया करते थे और यह छड़ी का इस्तेमाल कब से शुरू हुआ होगा, तो इस के बारे में मैंने रिसर्च शुरू कर दी। पहले तो मुझे अपने काम के दिन ही याद आ गए जब मैं इंगलैंड के एक शहर में बस ड्राइवर की नौकरी किया करता था। उस समय विकलांग लोग बसों में अक्सर चढ़ते ही रहते थे। कोई छड़ी के सहारे बस पे चढ़ता तो कोई वील्ह चेअर लिए आ जाता। पहले हम बटन दबा कर बस  का प्लैट फ़ार्म लोअर कर देते और इस के बाद वोह विकलांग औरत या मर्द वील्ह चेअर में बैठे बैठे इस को बस के अंदर ले आ कर एक खास जगह जो विकलांग लोगों के लिए ही होती है, वहां रिलैक्स हो जाता लेकिन कई विकलांग लोग ऐसे थे जो हिम्मत करके बस में चढ़ तो जाते थे लेकिन कोई न कोई यात्री या बस ड्राइवर ही उस की वील चेअर को इकठा कर के बस के अंदर ही एक वील चेअर के लिए बनी जगह पर रख देता था। यह हमारे लिए नॉर्मल बात ही थी।
                        छड़ी, लाठी या डंडा, कब से शुरू हुए तो इस का इतहास जानना असम्भव है लेकिन मेरा खियाल है कि यह चीज़ें शुरू से ही इंसान के साथी रहे होंगे और ख़ास कर पुरातन युग में जब लोग जंगलों में ही रहते होंगे। डंडा लाठी या छड़ी, उस समय जरूरी साथी रहा होगा क्योंकि जगह जगह सांप और दूसरे खतरनाक जानवर तो होंगे ही। चलते समय झाडिओं या लम्बे लम्बे घास को पहले हिला जुला कर देखना की कहीं सांप या अन्य खतरनाक जानवर न हो और जगह जगह पानी के छोटे बड़े तालाब को पार करने से पहले डंडे लाठी की मदद से पानी की गैहराई नाप लेना जरूरी रहा होगा। बूढ़े लोग भी लाठी डंडे का इस्तेमाल करते होंगे। फिर कभी किसी ऊंची पहाड़ जैसी जगह पर चढ़ने में भी इस का इस्तेमाल होता होगा। गाये भैंसें को डंडे से आगे ले जाना भी जरूरी रहा होगा जो अब भी है लेकिन जैसे जैसे इंसान उनती करता गया, ऐसी चीज़ें ज़िंदगी का हिस्सा ही बन गईं। एक डंडे से ज़मीन पर लकीर खींच कर दूसरों को कुछ समझाना या धरती के किसी टुकड़े पर अपना अधिकार जमाने के लिए धरती पर डंडे से लकीर खेंच देना कि यह मेरा हिस्सा है, भी आम होने लगा। किसी ख़ास लकड़ी से बना डंडा लाठी का भी फैशन होने लगा जैसे कि भारत में भी साधू संतों के पास कुछ ख़ास ढंग से मुड़ी हुई छड़ीआं परचलत थीं। सुख आसन में बैठ कुछ साधू लोग एक ख़ास तरह के डंडे के सहारे बैठे हुए देखे जा सकते हैं। बचपन में मैंने देखा है जब तगड़े जवान लड़के एक खास तरह की लाठी रखते थे जो उन की जवानी और ताकत की प्रतीक होती थी। लड़ाईआं तो इन डंडों या लाठीओं से आम ही लड़ी जाती थी। कंधे पर लाठी रख के चलना भी जवान लड़कों का फैशन होता था। एक ऐसा डंडा भी होता था जिस के बीच में तलवार होती थी। ऊपर खूबसूरत हैंडल होता था और बाहर से देखने में यह एक डंडे जैसी ही लगती थी। कुछ पछमी देशों में खूबसूरत पॉलिश किये हुए डंडे भी लोग रखते थे जिस के ऊपर एक छेद करके बीच में चमड़े का रिंग सा होता था। चलते समय इस चमड़े के रिंग में हाथ डाल के चलते थे ताकि सोटी या डंडा हाथ से गिर न जाये। डंडे के ज़मीन पर रखने वाले हिस्से पर एक तीखी पिन्न भी लगी होती थी ताकि चलते समय डंडा सलिप न हो। किसान लोग भी एक डंडे के एक सिरे पर पिन लगा लेते थे और जब कभी बैल चलने में हिचकिचाए तो उस को डंडे से यह पिन चुभा देते थे और बैल दौड़ने लगता था, मुझे याद है पंजाब में किसान लोग इसे आर कहते थे। पुलिस वाले तो आज भी डंडे हाथ में लिए घूमते है।
                   महाराजों या कुछ बड़े लोगों का फैशनेबल डंडे रखना भी एक फैशन होता था। इस का उपरला हिस्सा जो पकड़ने के लिए होता था, वोह सोने चांदी से भी बना होता था। यह उन का का एक सटेटस होता था। आम लोग, जिस के घुटने या कमर दर्द करती हो, वोह लंबी छतरी के ऊपरले मुड़े हुए हिस्से को पकड़ कर चल सकते थे। इंगलैंड में तो मैंने यह भी देखा है हमारे बहुत लोग पहले पहले छड़ी पकड़ने में शर्म महसूस करते हैं और छतरी के सहारे चलने लगते हैं लेकिन जब ज़्यादा ही तकलीफ बढ़ जाए तो फिर ही छड़ी हाथ में पकड़ते हैं। छड़ीआं भी अब बहुत सुन्दर सुन्दर और मज़बूत बनने लगी हैं। डंडे या लाठी के बारे में मैंने जो लिखा है, उस का सारांश तो सिर्फ और सिर्फ डिसएबिलिटी के बारे में ही लिखना है। शुरू में मैंने अपने रोलेट के गिरने की घटना बताई थी। आज हम इस छड़ी या वाकिंग फ्रेम के ऊपर कितना निर्भर करते हैं और आज बुढ़ापे या किसी रोग से पीड़त लोगों के लिए कितनी नई नई चीज़ें बाजार में आ गई हैं कि इस से हमारा जीवन कुछ आसान हो गया है। 1950स के करीब वाकिंग फ्रेम इज़ाद हुआ था, जो ऐलोमिनिअम का बना बहुत ही हल्का सा है। इस का फायदा यह हुआ कि जब छड़ी से चलना भी मुश्किल हो जाए तो इस वाकिंग फ्रेम की मदद से धीरे धीरे चलना आसान हो जाता है और इस में अच्छी बात यह है की इस के सहारे चलने से कुछ एक्सरसाइज़ हो जाती है नहीं तो डिसेबल इंसान को हर वक्त बैठे रहना ही पड़ता है। पहले जो फोर लैगड वाकिंग फ्रेम बना था, उस के साथ वील्ह नहीं होते थे और डिसेबल को हर कदम चलने पर फ्रेम को ऊपर उठा कर आगे रखना होता था यह कोई मुश्किल तो नहीं था क्योंकि यह ऐलोमिनिअम मैटल से बना हुआ बहुत हल्का होता है लेकिन फिर इस में एक नया डिज़ाइन आया जिस में आगे की दो लैग्ज़ को वील लगे थे और पिछला हिस्सा बगैर वील के। इस का फायदा यह हुआ की सारे फ्रेम को हर वक्त ऊपर उठाने की जरूरत नहीं होती। फ्रेम को सिर्फ थोड़ा धकेल कर आगे चला जा सकता है। इस डिज़ाइन से कुछ और आसान हो गया।
                    1978 के करीब एक स्वीडिश गोरा था जिस को पोलियो हो गया था। वोह एक इंजनीयर था और उस को चलने में बहुत परेशानी होती थी। उस ने तीन वील वाला रोलेट इज़ाद किया। इस के दोनों तरफ एक बाइसिकल की तरह हैंडल बनाये गए और इस को अपनी मर्ज़ी के मुताबक इधर उधर मोड़ा जा सकता है और इस के दोनों तरफ हैंडल के नीचे ब्रेक लगे हुए हैं जैसे बाइसिकल के ब्रेक होते हैं। इस रोलेट का यह फायदा हुआ कि चढ़ाई उतराई पर जाने के लिए हर दफा ब्रेक लगाते लगाते आगे चल सकते हैं। अगर चलते चलते शख्स थक जाए तो इस के लिए दोनों तरफ के हैंडलों के बीच में सीट भी बना दी गई। जब चाहे , ब्र्रेक लगा के इस के ऊपर कुछ देर के लिए आराम करके, फिर से सफर शुरू किया जा सकता है। अब इस में और डिज़ाइन भी आ गए हैं जिन में शॉपिंग बास्केट और शॉपिंग बैग भी लगा दिया है ताकि जो डिसेबल लोगों  में कुछ ताकत है वोह बाहर जा के कुछ शॉपिंग भी कर सकते हैं। इस का फायदा यह है कि एक तो इंसान घर में बंद नहीं रहता, दूसरे बाहर जा कर कुछ एक्सरसाइज़ हो जाती ही और ताज़ी हवा भी मिल जाती है, लोगों से बातें हो जाती हैं और मन ताज़ा रहता है। पिछले दस साल से मैं अपने घर में इस के सहारे ही हूँ वरना इतने सालों से मैं कुर्सी पे ही बैठा रहता क्योंकि बैलेंस न होने की वजह से मैं एक कदम भी चल नहीं सकता । इंगलैंड में रोलेट का चलन दस बारह साल पहले ही हुआ है लेकिन पहले पहले लोग रोलेट ले कर बाहर बहुत कम जाते थे लेकिन अब तो जो छड़ी के सहारे भी चल सकते हैं वोह भी रोलेट ले कर घूमते रहते हैं क्योंकि इस को फोल्ड करके बस में भी रखा जा सक्ता है और इस के सहारे शॉपिंग भी हो सकती है। डिसेबल लोगों के लिए स्कूटर तो बहुत सालों से उपलभ्द हैं। यह इंडिया वाले स्कूटर नहीं हैं, यह सिर्फ डिसेबल लोगों के लिए ही होते हैं। इन की स्पीड मुश्किल से दस मील घंटे की रफ़्तार ही होती है और यह बैटरी पर चलता है। बाहर घूम घाम के घर आ कर इसे पलग्ग लगा कर बैटरी चारज की जाती है। इस का बहुत फायदा है क्योंकि डिसेबल इंसान आज़ादी से जिधर मर्ज़ी घूम सकता है। आज इंसान ने डिसेबल लोगों के लिए बहुत सहूलतें पैदा कर ली हैं।
                        जिन लोगों ने डिसेबल लोगों के लिए इतनी सहूलतें मुहइया कर दी हैं, उन का मैं तहेदिल से धन्यवाद करता हूँ। मेरे पास दो छड़ीआं, दो रोलेट और एक वील चेअर मौजूद हैं। कहीं बाहर जाना हो, जैसे हस्पताल की अपॉएंटमेंट या विवाह शादी, तो मेरे पास एक वील चेअर भी है। जब वील चेअर की जरूरत हो तो बेटा इस में मुझे बिठा कर ले जाता है। जगह जगह घर के दरवाज़ों के दोनों तरफ हैंडल फिक्स हैं। नहाने के लिए स्पैशल गद्देदार कमोड जैसी चेअर है, जिस में बैठ कर आसानी से नहा लेता हूँ। अगर बाथ टब में नहाने की इच्छा हो तो टब के इर्द गिर्द तीन स्पोर्टिंग हैंडल लग्गे हुए हैं और इस में बैठ कर नहाने के लिए स्पेशल स्टूल भी है। रात को सोते समय बैड के एक तरफ स्पोर्टिंग हैंडल लग्गा हुआ है, जिस को पकड़ कर उठना आसान है। डिसेबल लोगों की आसानी के लिए इतना कुछ उपलभ्द है कि मर्ज़ी के मुताबक इस को ले के ज़िंदगी आसान की जा सकती है। मेरे पास दो कैचर भी हैं, एक आम सहूलत के लिए और एक बैड रूम के लिए। अगर अचानक कोईं चीज़ हाथ से नीचे गिर जाए तो कैचर की मदद से वहां ही बैठे बैठे उठाया जा सकता है और आगे झुकना नहीं पढता और छोटा सा कैचर मैंने अपने रोलेट के बैग में भी रखा हुआ है जो हर वक्त मेरे पास ही होता है। कहीं कोई पेपर यह अन्य चीज़ हाथ से गिर जाती है तो इस की मदद से वहां बैठे बैठे ही उठा सकता हूँ। डिसेबल लोगों की एक्सरसाइज़ के लिए भी बहुत चीज़ें इज़ाद हुई हैं। इस से एक्सरसाइज़ करके इंसान में पौज़िटिव रहने का हौसला बढ़ता है। ऐसी ही कुछ चीज़ें मैं भी रोज़ाना इस्तेमाल करता हूँ जिस से मेरा रोग बड़ा नहीं है। अगर न एक्सरसाइज़ करता तो आज शायद यह लेख लिख न रहा होता। यह लिखने का मेरा एक मकसद यह भी है की बहुत से लोग दुनीआं में विकलांग हैं। अपनी विक्लांगता पर रोना नहीं चाहिए बल्कि हौसले बुलंद करके डिसेबल के लिए बनी चीज़ों को इस्तेमाल में ला कर अपनी नॉर्मल ज़िंदगी जियें। अगर मेरी तरह कुछ लोग विकलांग हैं तो अपने इर्द गिर्द ऐसे गैजेट रखें जो मुश्किल समय में इन की सहायता ले सकें। भारत में गरीब वर्ग के लिए ऐसी सहूलतें सरकार को उपलभ्द करानी चाहियें ताकि वोह सामान्य ज़िंदगी जी सकें। विकलांग लोगों को अपने सहारे के लिए कुछ स्पोर्टिंग गैजेट्स हर वक्त अपन पास रखनी चाहिए क्योंकि ज़िंदगी में कभी कभी सहारे को भी सहारे की जरूरत पढ़ सकती है।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.