कविता – ‘प्रभु की माया’

हे! जगतगुरू जब –जब तुम्हें पुकारूं
तब–तब तुम बहरे क्यों?हो जाते हो।
क्या हवा लगी हैं इस दुनिया की
जो तुम अंधे भी बन जाते हो।।
आनाकानी जब–जब करते हो
मेरा साहस क्षीण होता हैं।
लाख जतन कर लूं  ऊपर उठने की
फिर भी नीचे गिर जाता हूं।
हें! जगतगुरु पुकार सुनों
ह्रदय में ज्ञान ज्योति प्रकाश भरों।
हरो हमारी बाधाओं को
और हमें निश्चिंत करों।।
हें! जगतगुरू अब रूठे– रूठे न बैठों
मैं दास हूं तेरे चौखट का।
करबद्ध निवेदन करता हूं
यह जानता हूं ये सब तेरी माया हैं ।।
-– रेशमा त्रिपाठी 

परिचय - रेशमा त्रिपाठी

नाम– रेशमा त्रिपाठी जिला –प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश शिक्षा–बीएड,बीटीसी,टीईटी, हिन्दी भाषा साहित्य से जेआरएफ। रूचि– गीत ,कहानी,लेख का कार्य प्रकाशित कविताएं– राष्ट्रीय मासिक पत्रिका पत्रकार सुमन,सृजन सरिता त्रैमासिक पत्रिका,हिन्द चक्र मासिक पत्रिका, युवा गौरव समाचार पत्र, युग प्रवर्तकसमाचार पत्र, पालीवाल समाचार पत्र, अवधदूत साप्ताहिक समाचार पत्र आदि में लगातार कविताएं प्रकाशित हो रही हैं ।