बहकावे की हद

                साहित्यिक लघुकथा मंच ‘नया लेखन नए दस्तखत’ पर विजेता लघुकथा

”ठहरो” बंदूक वाले शख्स ने कहा.
”मैं तो ठहर गया,” तिरंगे झंडे वाले शख्स ने ठहरते हुए कहा. ”महात्मा बुद्ध की तरह पूछ सकता हूं, तुम कब ठहरोगे?”
”तुम अमन हो?” बंदूक वाले शख्स ने उसे ध्यान से देखते कहा.
”हां, मेरा नाम अमन ही है, लेकिन तुम्हें कैसे पता?” तिरंगा लहराते हुए अमन ने कहा.
”रोशनी धुंधली है, इसलिए तुम शायद देख नहीं पा रहे हो, मैं तुम्हारी जैसी शक्ल का हूं. मुझे लोगों ने बताया था, कि हमने अमन को देखा है, हूबहू तुम्हारी शक्लो-सूरत का है.” बंदूक वाले शख्स ने कहा.
”तुम हामिद तो नहीं हो? मैंने भी सुना था. मेरे जुड़वां भाई को कोई उठाकर ले गया था, अब वह हामिद कहलाता है.” अमन कुदरत के करिश्मे पर हैरान था. ”मुझे पता नहीं था, कि हम जंग के मैदान में मिलेंगे.”
”इसे जंग का मैदान मत कहो भाई, यह तो राम-लक्ष्मण की मिलनस्थली है.” हामिद ने कहा, ”तुम तिरंगे को झुकने मत देना, मैं ही शस्त्र को तिलांजलि देता हूं, जाने किस बहकावे में आ गया!” हामिद ने शस्त्र फेंकते हुए बांहें फैलाईं.
बहकावे की हद समाप्त हो चुकी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।