परिश्रम की कमाई

असली संत-महंत कितनी सहजता से, स्तर के अनुरूप शिक्षा दे जाते हैं, यह आज भगवान गौतम बुद्ध का एक प्रेरक प्रसंग पढ़कर समझ में आ गया.
एक बार एक खानदानी सेठ उनकी सभा में पधारे और धर्म चर्चा में लीन हो गए. प्रवचन सुनने के पश्चात उन्होंने बुद्ध को अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया. बुद्ध ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया तो उनके शिष्यों ने उन्हें बता दिया कि तथागत केवल ताजा भोजन ही ग्रहण करते हैं. बस, और कोई विशेष आग्रह नहीं है. सेठ ने खुशी-खुशी उनकी यह बात मान ली.
गौतम बुद्ध अन्य भिक्षुओं के साथ सेठ के घर आए. स्वागत-सत्कार के बाद भोजन परोसने से पहले अपनी आदत के अनुसार सेठ को अपनी अपार धन-सम्पत्ति का बखान तो करना ही था. वे बोले-
‘प्रभु, हमारी यह हवेली और जमींदारी पुश्त दर पुश्त चली आ रही है. हमें कुछ करना ही नहीं पड़ता. पुरखों ने ही हमारे लिए सारा इंतजाम कर दिया है. उनका किया-धरा ही इतना है कि हमारी अगली सात पुश्तों को भी चिंता करने की जरूरत नहीं होगी.’
थोड़ी देर बाद सबके लिए भोजन परोसा गया. बुद्ध ने भोजन सामने आते ही कहा, ‘वत्स, आपको बताया गया था कि हम केवल ताजा भोजन ही ग्रहण करते हैं. हम यह बासी भोजन नहीं स्वीकार सकते.’
‘प्रभु ,कई घंटों के परिश्रम से यह भोजन अभी बनाया गया है. इसे आप बासी भोजन क्यों कह रहे हैं?” आश्चर्य चकित सेठ जी बोले.
‘क्योंकि इसमें तुम्हारे परिश्रम से अर्जित कुछ नहीं, तुम्हारे पुरखों का कमाया हुआ धन लगा है. जिस दिन तुम्हारी कमाई से भोजन बनेगा, वह ताजा भोजन कहलाएगा। उस दिन मैं खुशी-खुशी आपका भोजन ग्रहण करूंगा.” बुद्ध गंभीरता से बोले और बिना भोजन किए ही वहां से उठ गए.
तभी हमें याद आई बचपन में सुनी वह कहानी, जिसमें एक पिता अपने बेटे को अपनी अपार सम्पत्ति को बेदर्दी से खर्च करते देखकर उसे अपने परिश्रम की कमाई करने भेजता है. बहुत परिश्रम से वह एक रुपया कमाकर लाता है. उस एक रुपये को वह किसी भी हालत में कुएं में फेंकने को राजी नहीं होता, वह उसके कड़े परिश्रम की कमाई जो थी.
उस पिता को बेटे को समझाने में बहुत परिश्रम करना पड़ा, जब कि भगवान बुद्ध ने यह काम सहजता से सम्पन्न कर लिया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।