गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

जलता है आंगन

ग़ज़ल

जलता है आंगन, तपती है देहरी।
सुबह से शुरू होने लगती दोपहरी।।

आसानी से अब ये पटती कहाँ हैं।
दरारें दिलों की हुई इतनी गहरी।।

कानों में गूंजे सिक्कों की खन खन।
दलीलें कहाँ से सुनेंगी कचहरी।।

बस उंगली उठातीं हैं एक दूसरे पर।
आवाम-ए-मुल्क, अंधी गूंगी बहरी।।

निकलने लगी ये तो कद से भी ऊँची।
गुनाहों की फेहरिस्त यूँ लम्बी ठहरी।।

सड़कों पे तन, सर्द रातों में अकड़ें।
मजारों पे चादर रुपहली सुनहरी।।

परिचय - डॉ मीनाक्षी शर्मा

सहायक अध्यापिका जन्म तिथि- 11/07/1975 साहिबाबाद ग़ाज़ियाबाद फोन नं -9716006178 विधा- कविता, गीत,ग़ज़लें, बाल कथा, लघुकथा

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