अस्त हो गया पत्रकारिता का सूर्य

13 जून को प्रात: राजनाथ सिंह सूर्य के निधन का समाचार पाकर मैं स्तब्ध रह गया। मैं शाखा के बाद विश्व संवाद केन्द्र में चाय पी रहा था तब तक समाचार मिला कि सूर्य जी नहीं रहे। यह समाचार मुझको झकझोर देने वाला था कि क्योंकि 08 बजे उनसे मिलना तय था। एक दिन पूर्व उन्होंने स्वयं मुझे फोन किया था। राजनाथ सिंह सूर्य से मेरी पहली मुलाकात 2009 में विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ में हुई थी।  वह पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला के उद्घाटन में आये थे। मैं प्रतिभागी के नाते शामिल हुआ था। इसके बाद तो घनिष्ठता बढ़ती गयी। दो वर्ष पूर्व जब वह हिन्दूस्थान समाचार एजेंसी के निदेशक बनाये गये तब से उनसे लगातार मिलने का क्रम शुरू हुआ। उनसे मेरा निकट का संबंध था और अंत समय तक स्नेह निरंतर मिलता रहा। इसके तीन प्रमुख कारण थे कि पहला यह कि वह हमारे जिले अयोध्या के ही रहने वाले थे। दूसरा हमारे सहपाठी व मित्र राहुल सिंह के वह नाना लगते थे। तीसरा जो सबसे प्रमुख कारण था कि वह संघ के स्वयंसेवक और विश्व संवाद केन्द्र के संरक्षक थे।

राम मंदिर आंदोलन के समय उन्होंने सरकार व विहिप के बीच मध्यस्थता की भूमिका भी निभाई थी। वह अयोध्या मसले का समाधान जल्द से जल्द चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि अयोध्या में सरयू के किनारे मांझा क्षेत्र में बड़ी गौशाला खोली जाये और वहां पर देशी नस्ल की गाय रखी जाय। इसके अलावा वह कहते थे कि भव्य राम मंदिर बनने के बाद वहां पर सीता रसोई स्थापित हो जहां पर प्रतिदिन श्रद्धालुओं को भोजन प्रसाद खिलाया जाय। सीता रसोई में लगने वाला दूध और घी इसी गौशाला से आये। वह हमेशा अपारिग्रही रहे। अपने लिए कभी न कुछ कहा न कुछ चाहा, ना कुछ संग्रह किया। हिन्दुत्वनिष्ठ पत्रकार बाद में भाजपा में जाने के बावजूद सभी राजनीति दलों में उन्हें चाहने वालों की बड़ी संख्या थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों राम नरेश यादव, वीर बहादुर सिंह, नारायण दत्त तिवारी और मुलायम सिंह से उनका गहरा संबंध था। सपा बसपा कांग्रेस के नेताओं से उनके निकट के संबंध थे। विभिन्न दलों के नेताओं से देश समाज की समस्याओं पर निरंतर विचार-विमर्श भी करते थे। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और चन्द्रशेखर से उनका निकट का संबंध था।

पत्रकारिता की वजह से प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क के कारण आपातकाल के दौरान लखनऊ में स्कूटर से घूमा करते थे। आपातकाल के समय एक बार रज्जू भैया एक कार्यकर्ता के घर मिलने जा रहे थे। कैसरबाग में उनका स्कूटर खराब हो गया। संयोग से राजनाथ सिंह सूर्य कहीं जा रहे उनकी नजर पड़ी। उन्होंने अपनी गाड़ी खड़ी कर स्कूटर में कुछ देखने के बाद स्टार्ट हो गयी। रज्जू भैया ने धन्यवाद बोला। आगे बढ़े।

हिन्दुत्वनिष्ठ पत्रकारिता के शिखर पुरूष राजनाथ सिंह सूर्य का निधन पत्रकारिता जगत की अपूर्णीय क्षति है। निर्भीकता के साथ प्रमाणिकता उनकी विशेषता थी। सिद्धान्तों के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके निधन से पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। वह जब पत्रकारिता में आये उस समय पत्रकारिता में कम्युनिस्टों का बोलबाला था ऐसे समय में हिन्दुत्ववादी पत्रकारिता करना अपने आप में आसान काम नहीं था। लेकिन उन्होंने संवाददाता से लेकर कई अखबारों में संपादक भी रहे। इसके बावजूद उनका सरल और स्वाभाविक जीवन देखकर उनसे मिलने वाले उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे। उनकी सादगी पहनावे के साथ—साथ मन वचन और कर्म में भी दिखती थी। वह प्रसिद्ध से दूर रहना चाहते थे। उनका जीवन सरल और सादा था। वह अपनी बात कहने में जरा भी संकोच नहीं करते थे।  सामाजिक समरसता के पक्षधर थे। लखनऊ में नारद जयंती का कार्यक्रम होना था। आयोजक मण्डल ने सम्मानित करने वाले पत्रकारों की सूची उन्हें दिखाई। वह सूची देखते ही भड़क गये। उन्होंने कहा कि क्या हम लोग सामाजिक समरसता की केवल बात ही करेंगे। इसके बाद सूची में सुधार किया गया। अभी हाल ही में संपन्न प्रयागराज कुंभ में उनके साथ जाने और तीन दिन साथ रहने का सौभाग्य मिला। उनके कुंभ जाने की जानकारी उनके मित्र एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) राघवेन्द्र सिंह को थी। प्रयाग में एडवोकेट जनरल का सरकारी सुविधाओं से लैस बहुत बड़ा सरकारी बंगला है। राघवेन्द्र सिंह ने वहीं ठहरने का अनुरोध किया था और वहां बता रखा था। हम लोग प्रयाग पहुंचे तो लोग उन्हें लेने आ गये लेकिन वह कुंभ क्षेत्र में बनी पर्णकुटी में रूके। दूसरे दिन प्रयाग के जार्ज टाउन संघ कार्यालय में रूके।

राजनाथ सिंह सूर्य का जन्म 03 मई 1937 को अयोध्या के जनौरा गांव में कृषक परिवार में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा आर्य समाज के विद्यालय में हुई। बड़े भाई ठाकुर गया प्रसाद सिंह की प्रेरणा से वह संघ के स्वयंसेवक बने। 1948 में जब संघ पर गांधी हत्याकाण्ड का आरोप लगा तो देशभर में संघ कार्यकर्ताओं पर हमले हुए। राजनाथ के बड़े भाई शाखा में जाते थे इस वजह से गांव के लड़कों ने राजनाथ को पकड़कर पीट दिया। इण्टर की पढ़ाई के दौरान 15 अगस्त को स्कूल में एक नाटक का मंचन किया जाना था। इसमें राजनाथ सिंह को भी रोल करना था। उसी समय रायबरेली में संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य गुरू जी का प्रवास था। वह बीमारी का बहाना बनाकर स्वयंसेवक साथियों के साथ रायबरेली चले गये। रास्ते में जाते समय उनकी कक्षा के एक विद्यार्थी ने उन्हें देख लिया। उसने स्कूल में शिकायत की तो इसका दण्ड कक्षाध्यापक ने उन्हें दिया।

गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1960 में एमए करने के बाद तत्कालीन प्रान्त प्रचारक भाऊराव देवरस की प्रेरणा से 02 संघ के प्रचारक बने। 1962 के चुनाव में बस्ती में जनसंघ का संगठन मंत्री बनाया गया था। तब जिले की पांच सीटें जनसंघ ने जीती थी। तब बड़ा दबाव रहा कि राजनीति में आकर काम करूं लेकिन मना कर दिया। प्रचारक जीवन से वापसी के बाद हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में भाऊराव देवरस के कहने पर काम शुरू किया। कई वर्षों तक आज अखबार में ब्यूरो प्रमुख रहे। 1988 में राजनाथ सिंह दैनिक जागरण के सहायक संपादक बने और बाद में स्वतंत्र भारत के संपादक रहे। विभिन्न राजनैतिक दलों के दिग्गज नेता भी राजनाथ सिंह की लेखनी का लोहा मानते थे। श्री सिंह नौ वर्षों तक लगातार मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के महामंत्री रहे। राजनाथ सिंह समसामयिक मुद्दों पर लेखन के जरिए पत्रकारिता जगत में सक्रिय रहे। उनकी ‘अपना भारत’ पुस्तक पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
भाऊराव देवरस के कहने पर भाजपा में गये। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री का दायित्व संभाला। 1991 में विनय कटियार को फैजाबाद लोकसभा से चुनाव लड़ाने में उनकी महती भूमिका थी। संगठन ने उन्हें चुनाव लड़ने को कहा उन्होंने पत्रकारिता का हवाला देकर मना कर दिया। उन्होंने विनय कटियार का नाम सुझाया और उनके चुनाव के प्रबंधन के साथ— साथ आर्थिक मद्द भी कराई। अटल बिहारी बाजपेई के विरोध के कारण भी वह संसद के उच्च सदन राज्यसभा पहुंचे। वह 1996 से 2002 तक राज्यसभा सांसद रहे। यह बात उन्होंने खुद बतायी थी।

उम्र का प्रभाव होने के बावजूद उनके मन और बुद्धि पर शारीरिक दुर्बलता का प्रभाव अंत समय तक नहीं दिखा। उनके मन,वाणी और विचार में हमेशा ताजगी दिखती थी। भगवान की कृपा ही कहेंगे कि आखिरी समय तक उन्हें किसी का सहारा नहीं लेना पड़ा और निर्जला एकादशी के दिन उन्होंने अपना शरीर छोड़ा। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन दान का विशेष महत्व है। सूर्य जी ने अपने शरीर का दान समाज कार्य के लिए कर दिया। नाना जी देशमुख की प्रेरणा से उन्होंने देहदान का संकल्प पहले से ले रखा था। पर्किंसन के रोगी को नियमित व्यायाम करना व चलना बहुत ही आवश्यक होता है। वह नियमित अकेले ही टहलने जाते थे। जीवन के अंतिम क्षणों तक वह सक्रिय रहे। उनकी स्मृति भी गजब की थी। 82 वर्ष की अवस्था में भी पत्रकारिता जीवन की घटनाओं का तिथिवार विवरण उन्हें याद रहता था।

क्या राहुल गांधी मुर्छित कांग्रेस को जागृत कर पायेंगे। यह उनका अंतिम लेख था। इसको 03 जून को उन्होंने लिखा था। इस लेख में उन्होंने लिखा था कि नेहरू गांधी परिवार में चल रहा आनुवांशिक उत्तराधिकार खत्म नहीं होगा। सबने देखा भी राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने का जो नाटक किया उसका पटाक्षेप बहुत जल्दी हो गया। सूर्य जी ने आगे लिखा प्रियंका वाडरा को मैदान में उतारकर स्वयं कांग्रेस ने ही राहुल गांधी की क्षमता और पात्रता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था जो सही साबित हुआ। कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में तेजी से विलुप्त होने की दिशा में बढ़ रही है। भाजपा की विजय भाजपा कार्यकर्ताओं से अधिक योगदान राहुल गांधी का है। लोकसभा चुनाव से एन पहले उन्होंने लिखा था मोदी के मुकाबले कौन? उनका यह लेख काफी लोकप्रिय हुआ था। उनका शरीर जरूर पूरा हो गया लेकिन उनके विचार चिरकाल तक देश को दिशा देते रहेंगे।

बृजनन्दन राजू   

परिचय - बृज नन्दन यादव

संवाददाता, हिंदुस्थान समाचार