मरहम

अभी-अभी सौरभ के पिताजी का मैसेज आया था-
”घाव तो हर कोई दे सकता है,
‘मरहम’ बन पाओ तो जानें.”
‘मरहम’ शब्द ने सौरभ के दिल में हलचल मचा दी थी. अपने नाम के विपरीत सबको घाव ही तो देता था न सौरभ! कभी वे घाव वाग्बाणों के होते थे तो कभी कूंची-कलम के. तलवारों के घाव तो फिर भी भर जाते हैं, लेकिन वाग्बाणों और कूंची-कलम के घाव तो कभी भरते ही नहीं, यह वह जानता तो अच्छी तरह था, पर मानता नहीं था. जाने क्यों उसे सभी में खोट नजर आने लगी थी.
विधाता की कृति में भी तो उसने खोट निकाली थी न! पड़ोस वाले घर में उनके शारीरिक और बौद्धिक विकलांगता के साथ-साथ ठीक से बोलने में भी परेशान होने वाले बेटे के बारे में जाने क्या-क्या कहा था! अब उसे सोचने में भी शर्म आती है.
”उस बच्चे का ‘मरहम’ बना जा सकता है? यदि हां, तो कैसे?” उसने अपने आप से ही प्रश्न पूछा था.
जवाब ‘हां’ में मिला था, शायद उसके अपने मन की विकलांगता ठीक हो गई थी.
नकारात्मकता का नकाब उतारकर वह उस बच्चे का ‘मरहम’ बनने का सुदृढ़ निर्णय लेकर चल पड़ा था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।