सब हादसे दिन में मुक़म्मल होते नहीं

सब हादसे दिन में मुक़म्मल होते नहीं
कभी रात को देर तलक भी जागा करो

सपने कैसे नेस्तोनाबूत होते हैं हर कदम
कभी नंगे पाँव नींदों में भी भागा करो

हर शय दूर से खूबसूरत दिखती है जरूर
सच के वास्ते चाँद को ज़मीं पे भी उतारा करो

दिन में नहीं दिखता गर इज़्ज़त का व्यापार
कोई रात किसी झोपड़ी में भी गुजारा करो

वो जो बच्चा तिरंगा बेचता है फुटपाथों पे
अँधी गलियों में उसके रोने का भी नज़ारा करो

हिम्मत जवाब दे जाएगी कुछ करने में
गर कुछ किया है तो अच्छा भी दोबारा करो

सलिल सरोज

परिचय - सलिल सरोज

जन्म: 3 मार्च,1987,बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)। शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011), जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)। प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका"कोशिश" का संपादन एवं प्रकाशन, "मित्र-मधुर"पत्रिका में कविताओं का चुनाव। सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश। पता- B 302 तीसरी मंजिल सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट मुखर्जी नगर नई दिल्ली-110009 ईमेल : salilmumtaz@gmail.com