नया उपन्यास

अक्सर सुबह-सुबह वह रेडियो पर सुनता रहता था-
”सपने वो नहीं होते जो आप सोने के बाद देखते हैं,
सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते.”
सचमुच उसे भी महान साहित्यकार बनने के सपने ने सोने नहीं दिया. बचपन में ही उसने अनेक कविताएं व कहानियां लिख ली थीं. उसकी इन रचनाओं ने पहले चंदामामा, चंपक, लोटपोट में धूम मचाई, फिर वह सरिता, माया, मनोहर कहानियों का हीरो बन गया. ”तुम एक दिन महान साहित्यकार बन जाओगे, इतनी योग्यता है तुम्हारे अंदर.” पिता ने हौसला बढ़ाया था.
”तुम्हारी रचना पढ़कर तुम्हारी नानी तुम्हारा हाथ चूमती थीं, आशीर्वाद देती थीं.” मां का आशीर्वाद मुखर था.
हौसले और आशीर्वाद के समन्वय ने एक उपन्यासकार को भी जन्म दे दिया. 16 साल की आयु में ही उसने उपन्यास ”जीवन के मोड़ पर—–” लिख लिया था. यह उपन्यास उस समय भी धूम मचा सकता था, पर न जाने क्यों प्रकाशक को वह बच्चे की बचकानी हरकत लगी, इसलिए पांडुलिपि खेदसहित वापिस आ गई थी.
हारना या घबराना उसने सीखा नहीं था, ”रेखा के उस पार” दूसरा उपन्यास भी लिखा गया और सराहा गया.
तब तक इंटरनेट और ब्लॉगिंग का जमाना आ गया था. उसकी पढ़ाई भी पूरी हो गई थी, अब नौकरी और सपना साथ थे. उसने धारावहिक श्रंखला के रूप में उपन्यास ”जीवन के मोड़ पर—–” शुरु कर दिया. पहली कड़ी प्रकाशित होते ही 58 प्रतिक्रियाएं आ गईं, सब एक-से-एक बढ़कर. उससे भी अहम बात यह थी कि सबसे पहली प्रतिक्रिया उसी प्रकाशक की आई थी , जिसको वह बच्चे की बचकानी हरकत लगी थी और वह सकारात्मक थी. जैसे ही 21 कड़ियां पूरी हुईं, प्रकाशक ने उसकी ई.बुक बनाकर उसे भेज दी थी. बाद में उसने पूरे उपन्यास की 100 प्रतियां छपवाकर उसे भेज दी थीं, बदले में 58 रुपये भी नहीं लिए थे.
अब उसने नया उपन्यास ”सपनों का आसमां” लिखना शुरु कर अपने सपनों को आसमां तक पहुंचाने की राह चुन ली थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।